टीबी उन्नमूलन में एमडीआर और एक्सडीआर बड़ी चुनौती: डा. अजय वर्मा

Lucknow: तपेदिक यानि टीबी के मामलों में कमी तो आयी है लेकिन ड्रग रेजिस्टेंस लगातार बढ़ता जा रहा है और यह इसके इलाज में एक बड़ी चुनौती है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो टीबी उन्नूमल (TB eradication) के दिशा में किये जा रहे प्रयास नाकाफी साबित हो सकते हैं। यह कहना है डा. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) के पल्मोनरी विभाग (Pulmonary Department) के प्रमुख डा. अजय कुमार वर्मा (Ajay Kumar Verma) का।
लोहिया संस्थान में गुरुवार को विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बताया कि सामान्य टीबी का इलाज छह महीने में हो जाता है, लेकिन एमडीआर ( Multi drug resistant) व एक्सडीआर (Extensively drug-resistant) टीबी के मरीजों को लंबे और जटिल इलाज से गुजरना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एमडीआर टीबी वह स्थिति है जब टीबी के बैक्टीरिया दो प्रमुख दवाओं आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। वहीं, एक्सडीआर टीबी इससे भी अधिक गंभीर रूप है, जिसमें बैक्टीरिया कई दूसरी महत्वपूर्ण दवाओं के प्रति भी बेअसर हो जाते हैं।
टीबी के इलाज में लापरवाही, दवाएं बीच में छोड़ देना या गलत तरीके से लेना यह कई कारण हैं जो ड्रग रेसिस्टेंस को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा, समय पर जांच न होना और संक्रमण का देर से पता चलना भी एक बड़ी वजह है। डा. वर्मा ने कहा कि एमडीआर और एक्सडीआर टीबी के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि हमें सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि मरीजों की काउंसलिंग और फॉलोअप पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। अधूरा इलाज सबसे बड़ा खतरा है।

कार्यक्रम में प्रदेश भर से आए डॉक्टरों को पल्मोनरी और एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी के आधुनिक निदान और उपचार की तकनीकों से अवगत कराया गया। लोहिया संस्थान के निदेशक डॉ. सीएम सिंह (Dr, C,M. Singh) ने कहा कि आधुनिक जांच तकनीकों के आने से टीबी का सटीक और शीघ्र निदान संभव हो सका है, जिससे मरीजों को समय पर उपचार मिल रहा है। नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य पद्मश्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) ने बताया कि पिछले तीन दशकों में देश में टीबी प्रबंधन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और अब देश टीबी उन्मूलन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के डॉ. सूर्यकांत (Dr. Suryakant) ने कहा कि टीबी से होने वाली मौतों को कम करने के लिए रोग की जल्द पहचान, सही समय पर जांच और उचित उपचार बेहद आवश्यक है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने फेफड़ों के अलावा बच्चों, मस्तिष्क, पेट और आंतों में होने वाली टीबी की पहचान और इलाज के नए तरीकों की जानकारी दी। यूपी स्टेट टास्क फोर्स के अध्यक्ष डॉ. जीवी सिंह और सचिव डॉ. अजय कुमार वर्मा ने प्रशिक्षण सत्र का संचालन किया। कार्यक्रम में करीब 200 डॉक्टरों ने भाग लेकर नवीनतम चिकित्सा तकनीकों की जानकारी हासिल की।




