KGMU: दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में अभिभावकों की भूमिका अहम

लखनऊ। दिव्यांग बच्चों को रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े, इसके लिए इलाज के साथ अभिभावकों का सहयोग भी बेहद जरूरी है। घर पर नियमित अभ्यास से बच्चों में आत्मनिर्भरता बढ़ती है। यह सलाह किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के अलाइड हेल्थ साइंसेज के डीन प्रो. केके सिंह ने दी।
शनिवार को केजीएमयू के भौतिक चिकित्सा एवं पुनर्वास विभाग (DPMR) की ऑक्यूपेशनल थेरेपी इकाई ने एक अहम पैनल चर्चा का आयोजन किया। इसका विषय ‘दिव्यांग बच्चों की सहभागिता, आत्मनिर्भरता एवं समावेशन सुनिश्चित करने हेतु अभिभावकों का सशक्तीकरण’ था। यह आयोजन ऑल इंडिया ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स एसोसिएशन के सहयोग से किया गया।
केजीएमयू में बीओटी (BOT) कोर्स शुरू करने की आवश्यकता
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. केके सिंह ने ऑक्यूपेशनल थेरेपी की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बच्चों को खुद कपड़े पहनने और खाने-पीने जैसी दैनिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी दूर करने के लिए उन्होंने केजीएमयू में बैचलर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी (BOT) पाठ्यक्रम शुरू करने की जरूरत पर विशेष बल दिया।

विशेषज्ञों ने साझा किए विचार
पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने अभिभावकों के सही मार्गदर्शन और सकारात्मक व्यवहार को अहम माना। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास का उद्देश्य सिर्फ शारीरिक कठिनाई कम करना नहीं है। इसका मुख्य लक्ष्य बच्चों को घर, स्कूल और समाज में आगे बढ़ने के समान अवसर देना है। परिवार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शिक्षकों के बीच बेहतर समन्वय से बच्चों के लिए समावेशी माहौल तैयार किया जा सकता है।
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इन विशेषज्ञों की रही प्रमुख भागीदारी
कार्यक्रम में डीपीएमआर के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार गुप्ता, ऑक्यूपेशनल थेरेपी इकाई के पूर्व प्रभारी डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव और ऑल इंडिया ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. पंकज बाजपेयी मौजूद रहे।
पैनल चर्चा में डॉ. अनुपम सिंह, डॉ. आराधना शुक्ला, डॉ. पूजा मल्हौर और वरिष्ठ ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट डॉ. नितेश कुमार श्रीवास्तव ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का सफल आयोजन डॉ. नितेश कुमार श्रीवास्तव, डॉ. अरुण कुमार और डॉ. श्रीतोष सोनकर के नेतृत्व में हुआ। इसमें वी.के. दीक्षित, प्रदीप गंगवार, बलराम श्रीवास्तव और शुभ्रता श्रीवास्तव का भी अहम योगदान रहा।
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