पश्चिमी चंपारण (बगहा): जहां देश के कई हिस्सों में आज भी दहेज एक बड़ी सामाजिक कुप्रथा और अपराध बना हुआ है, वहीं बिहार के पश्चिमी चंपारण (बगहा) का थारू समाज (Tharu Tribe) पूरे देश के लिए एक नजीर पेश कर रहा है। नेपाल (Nepal) सीमा से सटे गोबरहिया थाना क्षेत्र के 20-22 थारू बहुल गांवों में पिछले 10 सालों में दहेज या महिला उत्पीड़न का एक भी मामला सामने नहीं आया है।
3 लाख की आबादी और हर साल 500 से ज्यादा शादियां
बगहा क्षेत्र के राजपुर, चौपरान, चईगांव, जम्हौली, डोन और रामगिर बराह गावा जैसे गांवों में रहने वाले थारू समाज की आबादी करीब 3 लाख है। इस समाज में हर साल 500 से अधिक शादियां होती हैं, लेकिन किसी भी शादी में दहेज का लेन-देन नहीं होता। यहां शादी में लड़की वालों की तरफ से लड़के को मात्र ₹5 से ₹11 का प्रतीकात्मक ‘नेग’ (शगुन) दिया जाता है।
दहेज लेना ‘पाप’, दोषी का सामाजिक बहिष्कार
इस बदलाव के पीछे किसी सरकारी कानून का खौफ नहीं, बल्कि समाज का अपना कड़ा अनुशासन है। भारतीय थारू कल्याण महासंघ के सचिव महेंद्र महतो के अनुसार, थारू समाज दहेज को पाप मानता है। अगर किसी परिवार पर दहेज लेने या देने का आरोप लगता है, तो तुरंत पंचायत बुलाई जाती है। जांच में दोषी पाए जाने पर जुर्माना लगाया जाता है और गंभीर मामलों में सामाजिक बहिष्कार तक की सजा दी जाती है।
पुलिस ने भी की पुष्टि
बगहा के एसपी रामानंद कौशल भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पिछले एक दशक में इन थारू बहुल गांवों से दहेज प्रताड़ना का कोई केस दर्ज नहीं हुआ है। छोटे-मोटे घरेलू विवाद भी पंचायत के स्तर पर ही सुलझा लिए जाते हैं।
शिक्षा और सफलता के बावजूद परंपराओं से जुड़ाव
थारू कल्याण बौद्धिक विचार मंच के अध्यक्ष शारदा प्रसाद बताते हैं कि समाज में शादी को एक पवित्र संस्कार माना जाता है, कोई सौदा नहीं। आज इस समाज के युवा डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और बैंकर जैसे ऊंचे पदों पर पहुंच रहे हैं, लेकिन दहेज न लेने का नियम सबके लिए समान है। शादी में रिश्तेदार मिल-जुलकर खर्च उठाते हैं और अपनी खुशी से दिए गए उपहारों को ही स्वीकार किया जाता है।
