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जन सुराज का ‘साइलेंट स्ट्राइक’ RJD-कांग्रेस को ले डूबा, 18 सीटों पर सीधा NDA को फायदा

पटना/नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे मुख्य रूप से NDA के पक्ष में रहे, लेकिन इन नतीजों के पीछे राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की नवगठित पार्टी जन सुराज (Jan Suraaj) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी ने भले ही एक भी सीट न जीती हो, लेकिन इसके प्रदर्शन ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस (Congress) के नेतृत्व वाले महागठबंधन को कई सीटों पर जीत से दूर कर दिया।

जन सुराज पार्टी ने पूरे चुनाव में लगभग 3.4% वोट शेयर हासिल किया और लगभग 115 सीटों पर यह पार्टी तीसरे स्थान पर रही। हालांकि, इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन सीटों पर पड़ा, जहाँ इसके उम्मीदवारों को मिले वोट की संख्या, विजेता और उपविजेता के बीच के जीत के अंतर (Winning Margin) से अधिक थी।

33 सीटों पर ‘जन सुराज’ ने बिगाड़ा खेल: NDA को 18 और महागठबंधन को 13 का फायदा

चुनाव आयोग के आंकड़ों के गहन विश्लेषण से पता चलता है कि कुल 33 विधानसभा क्षेत्रों में जन सुराज के उम्मीदवारों को मिले वोट जीत के अंतर से ज़्यादा थे। यानी, यदि जन सुराज के वोट महागठबंधन या NDA में बँटते नहीं, तो परिणाम पूरी तरह अलग हो सकते थे।

इन 33 सीटों में से, NDA ने 18 सीटें जीतीं, जबकि महागठबंधन को केवल 13 सीटें मिलीं। यह स्पष्ट करता है कि जन सुराज के वोटों के बिखराव का खामियाजा मुख्य रूप से महागठबंधन (RJD और कांग्रेस) को उठाना पड़ा। इनमें से 18 सीटें NDA (बीजेपी या जेडीयू) ने जीतीं, जबकि महागठबंधन (RJD/कांग्रेस) इन सीटों पर बहुत कम अंतर से पीछे रह गया।

इन 18 सीटों पर मिले वोटिंग पैटर्न को देखें तो, यह स्पष्ट है कि जन सुराज के कारण सत्ता विरोधी वोट बँट गए, जिसका सीधा लाभ NDA को मिला।

  • गोपालगंज (Gopalganj): बीजेपी ने यह सीट RJD से मात्र 4,500 वोटों के अंतर से जीती। लेकिन जन सुराज को यहाँ 5,800 वोट मिले। यह स्पष्ट है कि यदि जन सुराज मैदान में नहीं होती, तो ये अतिरिक्त वोट RJD की जीत सुनिश्चित कर सकते थे।

  • हाजीपुर (Hajipur): बीजेपी को 6,100 वोटों के अंतर से जीत मिली, जबकि जन सुराज ने यहाँ 7,500 वोट हासिल किए।

  • बरौली (Barauli): JDU ने यह सीट केवल 2,900 वोटों के अंतर से जीती, जबकि जन सुराज को 4,100 वोट मिले।

यह पैटर्न तरैया, पीरपैंती, शिवहर और बेनीपुर जैसी सीटों पर भी दोहराया गया, जहाँ जन सुराज के वोट, जीत के अंतर से लगभग 1,000 से 2,000 वोट अधिक थे। यदि जन सुराज के वोट महागठबंधन के खाते में जाते, तो NDA की 18 सीटें महागठबंधन की झोली में जा सकती थीं, जिससे चुनावी टैली पूरी तरह से बदल जाती।

महागठबंधन-जीती हुई 13 सीटों पर भी दिखा खतरा

विश्लेषण में यह भी सामने आया कि महागठबंधन ने जो 13 सीटें जीती हैं, वहाँ भी जन सुराज ने RJD और कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न किया था।

  • मारहावड़ा (Marhaura): RJD ने यह सीट जीती, लेकिन जन सुराज को यहाँ 8,900 वोट मिले, जबकि जीत का अंतर सिर्फ 2,100 वोटों का था। यदि जन सुराज को मिले अधिकतर वोट NDA के खाते में चले जाते, तो RJD यह सीट भी हार सकती थी।

  • साहेबपुर कमाल (Sahebpur Kamal): यहाँ RJD की जीत का अंतर सिर्फ 1,100 वोट था, जबकि जन सुराज को 3,500 वोट मिले।

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इन सीटों पर महागठबंधन की जीत एक तरह से “करीबी बचाव” (Close Shave) की तरह रही, क्योंकि जन सुराज ने दोनों गठबंधनों के वोटों में सेंध लगाई, लेकिन RJD और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर अधिक गहरा असर डाला।

जन सुराज का 3.4% वोट शेयर भले ही राष्ट्रीय राजनीति में छोटा आंकड़ा लगे, लेकिन बिहार जैसे कांटे के मुकाबले वाले राज्य में, जहाँ सैकड़ों वोटों से नतीजे बदल जाते हैं, यह ‘वोट-कटवा’ रणनीति ने RJD और कांग्रेस को भारी राजनीतिक मूल्य चुकाने पर मजबूर कर दिया। इन नतीजों से महागठबंधन के लिए भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करना अनिवार्य हो गया है, विशेष रूप से तब जब प्रशांत किशोर ने अगले चुनावों में और भी बड़े प्रदर्शन का दावा किया है।

इन आंकड़ों से साफ है कि प्रशांत किशोर की पार्टी, जिसने चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी, ने पहली बार चुनाव लड़कर बिहार की राजनीति में एक बड़ा विघटनकारी कारक (Disruptor Factor) के रूप में काम किया। भले ही पार्टी खुद कोई सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई, लेकिन उसके वोटों ने RJD और कांग्रेस की जीत की राह में रोड़ा बनकर, अप्रत्यक्ष रूप से NDA के बहुमत को और मज़बूत करने का काम किया।

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