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सख्त किए जाने चाहिए एलोपैथिक दवाओं के उपयोग के नियम

एलोपैथ की दवा बीमारी के दर्द से राहत तो जल्दी दिला देती है मगर उसका शरीर पर बुरा प्रभाव भी पड़ता है। इसके प्रति लोगों में जागरुकता की अभी भी कमी है। जरूरत है कि देश में एलोपैथिक दवाओं (Allopathic medicines) के प्रचार-प्रसार और वितरण के नियमों को सख्त किया जाए। वर्तमान हालात यह है कि फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि एलोपैथिक चिकित्सकों को लगातार नई दवाओं के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। यही नहीं कई दवा कम्पनियां आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी और अन्य चिकित्सा पद्धतियों को भी टारगेट कर रही हैं।

यह प्रवृत्ति जनता के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अगर समय रहते इसके लिए रणनीति न बनी तो गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
एलोपैथिक दवाएं अत्यधिक प्रभावशाली होती हैं। इनके सुरक्षित उपयोग के लिए फार्माकोलॉजी, दुष्प्रभाव, औषधि-परस्पर क्रियाएं, उचित मात्रा और इलाज की अवधि की जानकारी होना बहुत ही जरूरी है। ये विषय चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा में शामिल नहीं होते। जब गैर-एलोपैथिक चिकित्सक फार्मा कंपनियों के प्रभाव में आकर एलोपैथिक दवाओं का प्रयोग करते हैं तो इसका परिणाम अवैज्ञानिक और असुरक्षित दवा उपयोग के रूप में सामने आता है।

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दिखाई दे रहे हैं दुष्परिणाम

एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antibiotic Resistance): एंटीबायोटिक का अंधाधुंध और अवैज्ञानिक उपयोग, दवाओं के असर को कमजोर कर रहा है और खतरनाक संक्रमणों को जन्म दे रहा है। दवा जनित विषाक्तता और अंगों की विफलता-गलत खुराक और अनुपयुक्त दवाओं के संयोजन से गुर्दा, यकृत और हृदय जैसे महत्वपूर्ण अंगों को स्थायी क्षति पहुंच रही है। जनस्वास्थ्य पर खतरा- अनभिज्ञ मरीज असुरक्षित इलाज की चपेट में आ रहे हैं, जिससे रोग बिगडऩे की संभावना और बढ़ जाती है। इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि हर एलोपैथिक दवा एक विष के समान है इनका लाभ तभी है जब योग्य और प्रशिक्षित एलोपैथिक चिकित्सक द्वारा विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग किया जाए। गलत उपयोग जानलेवा साबित हो सकता है।

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किन नियमों को लागू करने की जरूरत

कठोर प्रतिबंध: फार्मा कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स केवल एलोपैथिक डॉक्टरों, क्लीनिकों और अस्पतालों तक ही सीमित रहें।

नियमन और जवाबदेही: जो कंपनियां गैर-एलोपैथिक चिकित्सकों को एलोपैथिक दवाओं का प्रचार करती हैं, उनके विरुद्ध नियामक कार्रवाई की जाए।

जागरूकता और प्रशिक्षण: जनता एवं चिकित्सकों को अवैज्ञानिक दवा उपयोग के खतरों के बारे में शिक्षित किया जाए।

नीति का क्रियान्वयन: सरकार द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हों कि एलोपैथिक दवाओं का प्रयोग केवल योग्य एलोपैथिक चिकित्सक ही करें।

यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स का मानना है कि एलोपैथिक दवाओं का विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक उपयोग न केवल चिकित्सीय आवश्यकता है बल्कि चिकित्सकों का नैतिक दायित्व भी है। मरीजों के स्वास्थ्य की रक्षा वाणिज्यिक हितों से कहीं ऊपर रखी जानी चाहिए।

लेखक
प्रो. डॉ. अनिल नौसरान
संस्थापक – यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स

Mahima Tiwari

महिमा तिवारी, द कवरेज में सीनियर पत्रकार हैं। वह राजनीति, हेल्थ, लाइफ स्‍टाइल और ह्यूमन एंगल स्टोरीज लिखती हैं। महिलाओं और बच्चों से संबंधित मुद्दों पर भी लिखना पसंद है। ग्राउंड रिपोर्टिंग और दिलचस्प कहानियां भी लिखती हैं। पत्रकारिता में 23 साल का अनुभव रखतीं हैं। करियर की शुरुआत यूपी इलेक्‍शन . कॉम से. IBN 7, जनसत्‍ता, स्‍वतंत्र भारत, वाॅयस आफ लखनऊ, में काम किया है।

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