मंथन

सुभद्रा कुमारी चौहान: सादगी की साध‍िका


अपनी लेखनी से हिन्‍दी जगत का गौरव बढ़ाने वालीं कव‍िय‍ित्री सुभद्रा सिंह चौहान की भाषा सरल थी। यही कारण है कि आज भी उनकी रचनाओं को पढ़कर हर वर्ग उसे सहर्ष गुनगुनाने लगता है। ओजस्‍वी लेखनशैली में इन्‍होंने सदैव वीरता और ममता का पुट दिया। समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों के विरूद्ध वह सदैव मुखर रहीं।

सुभद्रा कुमारी चौहान (जन्‍म- 16 अगस्त 1904 और मृत्‍यु- 15 फरवरी, 1948) का जन्‍म उत्‍तर प्रदेश के प्रयागराज स्‍थ‍ित निहालपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुर रामनाथ सिंह था। वह बचपन से ही अपनी शब्‍दशैली से सबका मन मोहने लगी थीं।

वर्ष 1913 में नौ वर्ष की आयु में सुभद्रा की पहली कविता प्रयाग से निकलने वाली पत्रिका ‘मर्यादा’ में प्रकाशित हुई थी। ‘नीम के पेड़’ पर लिखी गई यह कविता ‘सुभद्राकुँवरि’ के नाम से छपी थी। इस कव‍िता में उनकी कुशाग्र बुद्धि पर‍िलक्ष‍ित दिखी थी। बाल्यकाल से ही वह साहित्य में रुचि रखने के साथ ही अशिक्षा, अंधविश्वास, जातिवाद आदि रूढ़ियों के विरुद्ध अपने विचार प्रकट करती रही थीं। हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी जी के दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए। उन्होंने लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों की रचना की।

महादेवी वर्मा से मित्रता

स्‍कूली दिनों में ही सुभद्रा जी कव‍िताओं की रचना करने लगी थीं। इसी बीच उनकी एक सहेली बनी। दोनों ही साहित्‍य के प्रति आकर्ष‍ित थे। दोनों में कव‍िता और कहान‍ियों को लेकर चर्चा होने लगी। मगर उनकी यह नवीन सहेली गुमशुम सी रहती थी। मगर साहित्‍य के प्रति दोनों का समर्पण झलकने लगा था। देखते ही देखते वे अपनी क‍िसी भी कॉपी में कव‍िताओं की रचना करने लगीं। इसी बीच एक दिन सुभद्रा जी को अपनी सहेली की एक गण‍ित की कॉपी में एक कव‍िता मिली। उन्‍होंने इसे सबके सामने प्रचार‍ित कर दिया। पूरे स्‍कूल में वह कव‍िता पसंद की गई। सुभद्रा की उस सहेली का नाम महादेवी वर्मा था। वह भी साहित्‍यजगत को प्रकाश‍ित करने के लिये जानीं जाती हैं। 

घर-पर‍िवार के बीच लेखन में भी कुशल

सुभद्रा की पढ़ाई नवीं कक्षा के बाद छूट गई थी। शिक्षा समाप्त करने के बाद नवलपुर के सुप्रसिद्ध ‘ठाकुर लक्ष्मण सिंह’ के साथ आपका विवाह हो गया। यद्यप‍ि सुभद्रा जी में लिखने की प्रतिभा थी और अब पति के रूप में उन्हें ऐसा व्यक्ति मिला था जिसने उनकी प्रतिभा को पनपने के लिए उचित वातावरण देने का प्रयत्न किया। इसी कारण वह अपने लेखन क्षेत्र में सजग रहीं। जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी ‘कर्मवीर’ पत्र निकालते थे। इसी में उनके पत‍ि ठाकुर लक्ष्मण सिंह को नौकरी म‍िल गई। ऐसे में वह भी अपने पत‍ि के साथ जबलपुर आ गईं। यहॉं आने के बाद उन्‍हें माखनलाल चतुर्वेदी जी की छाया म‍िल गई। उनका सान‍िध्‍य म‍िलने के बाद वह रचनाओं में उत्‍कृष्‍टता का पुट देने लगीं। घर-पर‍िवार के बीच लेखन में भी कुशल साब‍ित हुईं। वह आगे चलकर कांग्रेस से भी जुड़ गईं। जहॉं उन्‍हें कांग्रेस के वर‍िष्‍ठ नेताओं को करीब से देखने का अवसर मिला। इसी माहौल के बीच वह अपनी लेखनी से स्‍वतंत्रता संग्राम में लोगों को जुड़ने के लिये प्रेर‍ित करने लगीं।

सामाज‍िक कुरीतियों का क‍िया विरोध

इनका पहला काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ 1930 में प्रकाशित हुआ। ‘झाँसी की रानी’ इनकी बहुचर्चित रचना है। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद भी उनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। बिखरे मोती (1932), उन्मादिनी (1934) और सीधे-सादे चित्र (1947) जैसी रचनाओं में इनकी प्रखर लेखनशैली का पर‍िचय मिलता है।

इन कथा संग्रहों में कुल 38 कहानियाँ हैं। उनकी अधिकांश कहानियाँ सत्य घटना पर आधारित हैं। देश-प्रेम के साथ-साथ उनमें ग़रीबों के लिए सच्ची सहानुभूति दिखती है। इन्‍होंने अपनी कहानियों में तत्‍कालीन उभरते सामाज‍िक सवालों को ध्‍यान में रखते हुये उसे केंद्र में रखते हुये रचना की। समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों का ध्‍यान खींचने में वह इसी कारण पूर्णत: सफल रहीं।

कहान‍ियों में है नारी विमर्श

सुभद्रा जी की कहान‍ियॉं नाय‍िका प्रधान होती थीं। एक नारी के दर्द और दंश को उन कहान‍ियों के माध्‍यम से वह जीव‍ित कर देती थीं। उन कहान‍ियों से ऐसा प्रतीत होता है क‍ि वह समाज में नार‍ियों की स्‍थ‍िति को लेकर काफी चिंतित थीं। उनकी कहान‍ियों की नाय‍िकायें किसी न किसी सामाज‍िक बंधनों के पाश में बँधी  मिलती हैं। वह महिला उत्‍थान की प्रेरणा के साथ अपनी रचनाओं का सृजन करती थीं। पर्दा प्रथा का व‍िरोध करने के लिये उन्‍हें अपने घर में भी विरोधी स्‍वरूप अपनाना पड़ा था।

इस सम्‍बंध में कहा जाता है कि जब उनका व‍िवाह हुआ तो उनके ससुराल में यह पता चला कि वह पर्दा रखना पसंद नहीं करती हैं। इसके बाद तो उनके जेठ ने अपना कड़ा विरोध दर्ज कर दिया। अपने जेठ की नाराजगी को देखने के बाद उन्‍होंने घूँघट निकाल लिया। इसके बाद जब वह ऑंगन में पहुँचीं तो पुन: पर्दा हटा लिया। घर की महिलाओं को उनका यह विरोधी तेवर उस समय तो खराब लगा लेकिन एक समय के बाद वह सुभद्रा जी के विचारों से सहमत हो गईं। उनके पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह को जब इसका पता चला तो वे भी अपनी पत्‍नी के विचारों के समर्थन में रहे। धीरे-धीरे उनके घर में से इस प्रथा का अंत हो गया।

गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ने बदला जीवन

वर्ष 1919 में जल‍ियांवाला बाग कांड हुआ। पूरे देश में अँग्रेजों के प्रति लोगों में क्रोध व्‍याप्‍त हो गया। ऐसे में स्‍वतंत्रता संग्राम से जुड़े सुभद्रा जी के पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह भी प्रभाव‍ित हो गये। उधर, सुभद्रा जी ने इसका तीव्र विरोध करते हुये अपनी कविता से लोगों में इस कांड के प्रति विद्रोह की भावना को जगा दिया। क्रॉंतिकार‍ियों के बीच सुभद्रा जी अब चर्चा में आ गई थीं।

इसी बीच महात्‍मा गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के लिये देशवास‍ियों को पुकारा। इस पुकार से प्रेरित होकर दोनों पति-पत्‍नी अपनी पढ़ाई को अधूरा छोड़कर आंदोलन में शाम‍िल हो गये। सुभद्रा जी के लेख और कव‍िताओं के माध्‍यम से इस आंदोलन को एक अलग ही बल मिला। वर्ष 1920 और 1921 में उन्‍होंने स्‍वतंत्रता संग्राम की भावना से प्रेरित होकर ‘राखी की लाज’ और ‘जल‍ियाँवाला बाग में बसंत’ शीर्षक से दो कव‍िताओं की रचना की। इससे उनकी प्रस‍िद्धी और प्रखर हो गई।

कुछ समय के बाद अचानक ही पति-पत्‍नी को प्रस‍िद्ध समाचार पत्र ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी का एक पत्र मिला। उसमें लक्ष्‍मण सिंह को सम्‍पूर्ण तरीके से देशसेवा के लिये समर्प‍ित होने का संदेश भेजा गया था। इसके बाद ही दंपति ने जबलपुर में जाने का निर्णय लिया था। वहॉं जाने के बाद सुभद्रा जी ने सामाज‍िक कार्यों में अपना समय देना आरम्‍भ कर दिया। उन्‍होंने छूआछूत और पर्दा प्रथा का विरोध करने के साथ ही स्‍वतंत्रता संग्राम में शामि‍ल होने के ल‍िये लोगों को प्रेरित करने का कार्य तेजी से शुरू कर दिया।

पति के जेल जाने पर संभाली कमान

यही नहीं अँग्रेजी हुकूमत के विरोध में लिखने के कारण जब माखनलाल चतुर्वेदी और लक्ष्‍मण सिंह को जेल में डाल दिया गया तो सुभद्रा जी ने जग-जागरण का कार्य सम्‍भाल लिया। सत्‍याग्रह आंदोलन में भी वह सजग रहीं। इसी कारण अँग्रेजों ने उन्‍हें भी ग‍िरफ्तार कर जेल भेज दिया।

जबलपुर में सत्‍याग्रह के दौरान ग‍िरफ्तार होने वालीं वह पहली महिला थीं। इस कारण वह देशभर में चर्चि‍त हो गईं। उनकी ख्‍याति को ऐसा समझा जा सकता है क‍ि उन दिनों सरोजिनी नायडू एक देशभक्‍त नेत्री के रूप में प्रस‍िद्ध हो चुकी थीं। उसी की तर्ज पर सुभद्रा जी को भी अमिट रचनाओं और बुलंद आवाज़ के लिये जाना जाने लगा। देश के प्रतिष्‍ठ‍ित समाचार पत्रों में उनकी रचनाओं को प्रमुखता से छापा जाने लगा। वह अपने जीवनकाल में दो बार वर्ष 1923 और 1942 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए जेल भेजी गयीं।


सादगी की साध‍िका

सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी लेखनी में की तरह ही वेष-भूषा में भी दिखावे से बचती थीं। वह सदैव सादे रंगों के कपड़े पहनती थीं। एक बार वह जब असहयोग आंदोलन के दौरान महात्‍मा गांधी और उनकी पत्‍नी कस्‍तूरबा गांधी से मिलने गईं तो उनको देखकर गांधी जी विचार में पड़ गये। उन्‍होंने प्रेमपूर्वक पूछा क‍ि बेटी तुम्‍हारी शादी हुई है या नहीं? इसके जवाब में उन्‍होंने बताया क‍ि उनका विवाह हो चुका है। यह सुनते ही गांधी जी और उनकी पत्‍नी दोनों अवाक् हो गये। कस्‍तूरबा जी का चेहरा उतर गया।

इसके बाद गांधी जी ने उन्‍होंने डॉंटते हुये कहा क‍ि जब विवाह हो चुका है तो इस तरह के सादे कपड़े पहनने का क्‍या अर्थ है? मांग में सिंदूर तक नहीं लगाया है। उन्‍होंने सुभद्रा जी को आदेश देते हुये कहा क‍ि कल भेंट करने के लिये पुन: आइयेगा। इससे यह पता चलता है क‍ि सामाजिक कार्यों में वह इतनी मगन रहती थीं क‍ि वह स्‍वयं पर ध्‍यान ही नहीं देती थीं। गांधी जी ने भी एक उभरती नेत्री और कव‍िय‍ित्री को इतनी सादगी से देखना स्‍वीकार नहीं क‍िया। 

रचनाओं में भावनाओं का तालमेल

इनकी रचनाओं में कई स्‍थानों पर ऐसा वर्णन पाया जाता है जब यह तात्‍कालीन समाज में व्‍याप्‍त पर्दा प्रथा और महिलाओं की समाज में कम स्‍वीकार्यता को लेकर पीड़‍ित द‍िखती हैं। अपनी रचनाओं के माध्‍यम से वह इस पीड़ा को उजागर करने में पूर्णत: सफल रहीं। उनकी ऐसी ही एक रचना में वह पुरुष प्रधान समाज से महिलाओं पर लगे सामाज‍िक बंधनों से मुक्‍त‍ि की आशा प्रकट करते हुये लिखती हैं…

सबल पुरुष यदि भीरु बनें, तो हमको दें वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें देश में, करें युद्ध घमासान सखी।
पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ, दहला दें ब्रह्मांड सखी।
भारत लक्ष्मी लौटाने को, रच दें लंका काण्ड सखी।

बेट‍ियों के प्रति उनके मन में वात्‍सल्‍य भाव अथाह सागर के रूप में संच‍ित था। उनकी ऐसी ही एक कव‍िता में बचपन में बाल‍िकाओं की किलकार‍ियों का वर्णन मिलता है। वह लिखती हैं…

मैं बचपन को बुला रही थी
बोल उठी बिटिया मेरी
नंदन वन सी फूल उठी
यह छोटी-सी कुटिया मेरी।

यही नहीं वीरता का उन्‍होंने अपनी सरल भाषाशैली में ऐसा बखान किया क‍ि हर उम्रवय का पाठक देश को स्‍वतंत्र कराने के लिये फड़कने लगता था। ‘वीरों का कैसा हो बसन्‍त’ उनकी ऐसी रचना है जो आज भी प्रासंग‍िक है।

गलबांहें हों या हो कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग
बतला अपने अनुभव अनन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।

वर्ष 1917 में हुये ‘जलियांवाला बाग’ के नृशंस हत्याकांड से उनके मन पर गहरा आघात लगा था। वह इस संदेश को सुनकर शोक संतप्‍त हो गईं। उन्होंने अपनी पीड़ा को उजागर करते हुये लिखा-

परिमलहीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है
हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना
यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

गांधी जी की मृत्‍यु से हो गईं व्‍यथ‍ित

5 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ तो सबने खुशियाँ मनाईं। सुभद्रा जी ने भेड़ाघाट में रहने वाले खान मजदूरों को कपड़े और मिठाई बाँटीं। उस दिन वह दिनभर चहकती दिखीं। वह आराम करना भूल गई थीं। गांधी जी की हत्या से सुभद्रा जी को गहरा आघात लगा था। वह स्‍वयं को एक अनाथ समझ रही थीं। खबर मिलते ही वह बगैर कुछ खाए-पीये चार मील पैदल ग्वारीघाट तक गईं।

सुभद्रा जी ने कहा, ‘मैंने तो सोचा था कि मैं कुछ दिन गांधी जी के आश्रम में बिताऊँगी लेकिन परमात्मा को वह भी मंजूर नहीं था!’ 12 फरवरी, 1948 को गांधी जी की अस्थियाँ नर्मदा में विसर्जन करने के लिए लाई गईं। सुभद्रा जी दल-बल के साथ गांधी जी की अस्थियाँ लेने मदनमहल स्टेशन गईं और पुलिस का घेरा तोड़ दिया।

कार दुर्घटना में हो गई मृत्‍यु

14 फरवरी को वे नागपुर में शिक्षा विभाग की मीटिंग में भाग लेने गईं। डॉक्टर ने रेलगाड़ी से नहीं, कार से जाने की सलाह दी। 15 फरवरी, 1948 को दोपहर के समय वे जबलपुर के लिए वापस चलीं। सुभद्रा ने देखा कि बीच रास्ते में तीन-चार मुर्गी के बच्चे हैं। उनका बेटा कार चला रहा था।

उन्होंने अचकचाकर बेटे से कहा, ‘अरे बेटा…मुर्गों के बच्चों को बचाओ।’ बेटे ने गाड़ी को तेजी से मोड़ दिया। उसका नियंत्रण हट गया। कार तेजी से काटने के कारण सड़के किनारे के पेड़ से टकरा गई। सुभद्रा जी बेहोश हो गईं। सुभद्रा जी ने वहीं प्राण त्‍याग दिये। इसी के साथ हिन्‍दी साहित्‍य  जगत में महान रचनाकार का स्‍थान र‍िक्‍त हो गया। पूरे देश में इसकी सूचना मिलते ही शोक की लहर चल पड़ी।

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