गरुड़ पुराण दिखता है मानव जीवन के कल्याण का रास्ता

गरुड़ पुराण वेदव्यास जी द्वारा लिखित 18 पुराणों में से एक है। यह मानव जीवन को कल्याण का रास्ता दिखाता है। गरुड़ पुराण पढ़ने से व्यक्ति मोक्ष का भागीदार बनता है।
गरुड़ पुराण का सार-
गरुड़ जी ने कहा, हे केशव– जिस-जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियों में जीव जाते हैं, वह मुझे बताइए।
श्रीभगवान ने कहा- नरक से आये हुए पापी जिन पापों के द्वारा जिस योनि में आते हैं और जिस पाप से जो चिह्न होता है, वह मुझसे सुनो। ब्रह्महत्यारा क्षय रोगी होता है, गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है। कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी होता है और ये तीनों पापी चाण्डाल योनि प्राप्त करते हैं।
स्त्री की हत्या करने वाला तथा गर्भपात कराने वाला पुलिन्द (भिल्ल) होकर रोगी होता है। परस्त्रीगमन करने वाला नपुंसक और गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला चर्म रोगी होता है। मांस का भोजन करने वाले का अंग अत्यन्त लाल होता है, शराब पीने वाले के दाँत काले होते हैं, लालचवश अभक्ष्य भक्षण करने वाले ब्राह्मण को महोदर (बड़ा पेट वाला (बड़ा उदर)) रोग होता है। जो दूसरे को दिये बिना मिष्ठान्न खाता है, उसे गले में गण्डमाला (थायरॉइड ग्रंथि का आकार बढ़ना) रोग होता है, श्राद्ध में अपवित्र अन्न देने वाला श्वेतकुष्ठी (श्वेत कुष्ठ रोग) होता है।
गर्व से गुरु का अपमान करने वाला मनुष्य, मिरगी का रोगी होता है। वेदशास्त्र की निन्दा करने वाला निश्चित ही पाण्डुरोगी (एनीमिया-खून की कमी का रोगी) होता है। झूठी गवाही देने वाला गूँगा, पंक्तिभेद (जानबूझकर एक निश्चित अर्थ व्यक्त करने के लिए पंक्ति तोड़ा जाना) करने वाला काना, विवाह में विघ्न करने वाला व्यक्ति ओष्ठ (होंठ) रहित और पुस्तक चुराने वाला जन्मान्ध होता है। गाय और ब्राह्मण को पैर से मारने वाला लूला-लंगड़ा होता है, झूठ बोलने वाला हकलाकर बोलता है तथा झूठी बात सुनने वाला बहरा होता है।
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विष देने वाला मूर्ख और उन्मत्त (पागल) तथा आग लगाने वाला खल्वाट (गंजा) होता है। पल (माँस) बेचने वाला अभागा और दूसरे का मांस खाने वाला रोगी होता है। रत्नों का अपहरण करने वाला हीन जाति में उत्पन्न होता है, सोना चुराने वाला नखरोगी और अन्य धातुओं को चुराने वाला निर्धन होता है। अन्न चुराने वाला चूहा और धान चुराने वाला शलभ (टिड्डी) होता है। जल की चोरी करने वाला चातक (बारिश की बूंदों को ही पीने वाला पपीहा पक्षी) और विष का व्यवहार करने वाला वृश्चिक (बिच्छू) होता है। शाक-पात चुराने वाला मयूर होता है, शुभ गन्धवाली वस्तुओं को चुराने वाला छुछुन्दरी होता है, मधु चुराने वाला डाँस, मांस चुराने वाला गिद्ध और नमक चुराने वाला चींटी होता है।
ताम्बूल, फल तथा पुष्प आदि की चोरी करने वाला वन में बंदर होता है। जूता, घास तथा कपास को चुराने वाला भेड़ योनि में उत्पन्न होता है। जो रौद्र कर्मों (क्रूरकर्मों) से आजीविका चलाने वाला है, मार्ग में यात्रियों को लूटता है और जो आखेट का व्यसन रखने वाला, वह कसाई के घर का बकरा होता है। विष पीकर मरने वाला पर्वत पर काला नाग होता है। जिसका स्वभाव अमर्यादित है, वह निर्जन वन में हाथी होता है। बलिवैश्वदेव (सभी प्राणियों और देवताओं के लिए बलिदान या भेंट) न करने वाले तथा सब कुछ खा लेने वाले द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) और बिना परीक्षण किये भोजन कर लेने वाले व्यक्ति निर्जन वन में व्याघ्र (बाघ) होते हैं। जो ब्राह्मण गायत्री का स्मरण नहीं करता और जो संध्योपासना नहीं करता, जिसका अन्तःस्वरुप दूषित तथा बाह्य स्वरूप साधु की तरह प्रतीत होता है, वह ब्राह्मण बगुला होता है।
जिनको यज्ञ नहीं करना चाहिए, उनके यहाँ यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण गाँव का सूअर होता है, क्षमता से अधिक यज्ञ कराने वाला गर्दभ (गधा) तथा बिना आमंत्रण के भोजन करने वाला कौआ होता है। जो सत्पात्र शिष्य को विद्या नहीं प्रदान करता, वह ब्राह्मण बैल होता है। गुरु की सेवा न करने वाला शिष्य बैल और गधा होता है। गुरु के प्रति अपमान के तात्पर्य से हुं या तुं शब्दों का उच्चारण करने वाला और वाद-विवादों में ब्राह्मण को पराजित करने वाला जल विहीन अरण्य में ब्रह्म राक्षस होता है। प्रतिज्ञा करके द्विज (चन्द्रमा) को दान न देनेवाला सियार होता है। सत्पुरुषों का अनादर करने वाला व्यक्ति अग्निमुख सियार होता है। मित्र से द्रोह करने वाला पर्वत का गीध होता है और क्रय में धोखा देने वाला उल्लू होता है। वर्णाश्रम की निन्दा करने वाला वन में कपोत होता है। आशा को तोड़ने वाला और स्नेह को नष्ट करने वाला, द्वेष वश स्त्री का परित्याग कर देने वाला बहुत काल तक चक्रवाक (चकोर) होता है।
माता-पिता, गुरु से द्वेष करने वाला तथा बहन और भाई से शत्रुता करने वाला हजारों जन्मों तक गर्भ में या योनि में नष्ट होता रहता है। सास-ससुर को अपशब्द कहने वाली स्त्री तथा नित्य कलह करने वाली स्त्री जलौका अर्थात जल जोंक होती है और पति की भर्त्सना करने वाली नारी जूँ होती है। अपने पति का परित्याग करके परपुरुष का सेवन करने वाली स्त्री वल्गुनी (चमगादड़ी), छिपकली अथवा दो मुँह वाली सर्पिणी होती है। सगोत्र की स्त्री के साथ संबंध बनाकर अपने गोत्र को विनष्ट करने वाला तरक्ष (लकड़बग्घा) और शल्लक (साही) होकर रीछ योनि में जन्म लेता है। तापसी (तपस्विनी) के साथ व्यभिचार करने वाला कामी पुरुष मरु प्रदेश में पिशाच होता है और अप्राप्त यौवन से संबंध करने वाला वन में अजगर होता है। गुरु पत्नी के साथ गमन की इच्छा रखने वाला मनुष्य कृकलास (गिरगिट) होता है। राजपत्नी के साथ गमन करने वाला ऊँट तथा मित्र की पत्नी के साथ गमन करने वाला गधा होता है।
गुदा गमन करने वाला विष्ठा (मल, गुह, त्याज्य वस्तु) भोगी सूअर तथा शूद्रागामी बैल होता है। जो महाकामी होता है, वह काम लम्पट घोड़ा होता है। किसी के मरणाशौच (किसी की मृत्यु के बाद परिवार और जाति के सदस्यों पर लगने वाला अशौच (शुद्धि)। यह एक सूतक है जो मृत्यु के बाद लगता है और एक निश्चित अवधि तक चलता है, जिसके दौरान कुछ धार्मिक कार्य वर्जित होते हैं। इसकी अवधि को आमतौर पर 10 से 13 दिनों तक माना जाता है, लेकिन यह समाज और परम्परा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। मरणाशौच की अवधि के दौरान, परिवार के सदस्यों को पूजा-पाठ, देवदर्शन, संध्या वंदन आदि जैसे कई धार्मिक और सामाजिक कार्य करने से रोका जाता है। निश्चित अवधि के बाद, सामूहिक स्नान और केश आदि कटवाकर शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी की जाती है।) में एकादशाह (मरने के ग्यारहवें दिन होने वाला कर्मकांड और श्राद्ध) तक भोजन करने वाला कुत्ता होता है। ददेवद्रव्य (देव यानी भगवान या मंदिर से संबंधित द्रव्य) भोक्ता देवलक ब्राह्मण (वेतन भोगी पुजारी या ब्राह्मण) मुर्गे की योनि प्राप्त करता है। जो ब्राह्मणधम द्रव्यार्जन के लिये देवता की पूजा करता है, वह देवलक कहलाता है। वह देवकार्य तथा पितृकार्य के लिये निन्दनीय है।




