आरक्षण किस काम का? जब सिर्फ “नौकरी” ही करनी है… अपने समाज के मालिक कब बनेंगे हम
अपने बच्चों को हुनरमंद बनाइए। नौकरी के लिए बंधुआ बनाने की जरूरत नहीं है।
जैसा कि आज समाज में चारों तरफ शोर है उस नजरिए से देखें तो आपको लगेगा आज नौकरी के अवसर सीमित होते जा रहे हैं। सरकारी नौकरियां तेजी से कम हो रही हैं, ठेके की व्यवस्था बंधुआगिरी बढ़ा रही हैं, दूसरी तरफ प्राइवेट संस्थान भी लगातार नौकरी कम से कम करने की जुगत में हैं।
हम सरकारों से आरक्षण को लेकर तमाम तरह की उम्मीदें पाले बैठे हैं। ये सही है कि आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जा सकता। ये जरूरी है। लेकिन सोचिए क्या ऐसा नहीं है कि पूरा समाज आज आरक्षण पर ही आश्रित हो गया है?
एक तरफ बहुजन समाज है…. हर जगह ज्यादा से ज्यादा आरक्षण की मांग करता है। वहीं दूसरी तरफ अपरकास्ट है, जिसे लगता है कि आरक्षण उसके मौके कम कर रहा है। वह आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग उठाता है।
लेकिन ठहरिए, जरा सोचिए…. क्या हम सभी एक तिलिस्म में नहीं फंस चुके हैं?
उदाहरण से समझाता हूं-
एक परिवार जिसके पास पुरखों का बढ़ई कारीगरी का हुनर था, आरक्षण आने के बाद उस परिवार के घर नौकरी ने दस्तक दी और यहीं से पूरी कहानी बदल गई।
फिर नौकरी पाने वाले बेटे ने कहा कि पिताजी अब आप ये बढ़ई वाला काम नहीं करेंगे। बहुत मेहनत कर ली। अब आप घर बैठकर आराम से जीवन गुजारेंगे।
उस बेटे के दो पुत्र हुए, जाहिर है उनकी परवरिश में ही सिर्फ नौकरी थी… वे अच्छे स्कूल गए। आरक्षण की सहायता से उन्होंने और बेहतर नौकरी हासिल की। फिर उनके बच्चे बड़े हुए उन्होंने एमएनसी में बढ़िया पैकेज में नौकरी हासिल की।
अब अगली पीढ़ी आज खड़ी है…. उसके सामने सरकारी नौकरी का ऑप्शन कम हो चुका है, क्योंकि वर्षों से तमाम नौकरियां रुकी हैं या कोर्ट में फंसी हुई हैं। वहीं एमएनसी में नौकरी भी तलवार की धार पर चलने जैसी है, कब बाहर कर दिए जाएं पता नहीं।
इन्हीं झंझावतों में फंसा वो शख्स जब नेताओं को जब आरक्षण को लेकर ये कहते सुनता है कि “जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी” तो उसे वह नेता किसी मसीहा जैसा दिखता है। उसे लगता है कि आरक्षण का दायरा बढ़ जाने से ये उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।
ये विचार तो अच्छा है लेकिन जरा सोचिए उसके बाप-दादा के मन में भी तो क्या यही विचार नहीं आया था…. जब पहली बार आरक्षण व्यवस्था लागू हुई थी। लेकिन आखिर में हुआ क्या? आज तीसरी पीढ़ी पार करते-करते परिवार कहां खड़ा है? उसी नौकरी के चक्कर में हैरान-परेशान।
अब जरा इस तरह सोचिए…. उस समय बेटे ने पिता को बढ़ई का काम करने से नहीं रोका होता तो क्या होता? घर में एक बेटा आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी पाता और दूसरा बेटा पिता के साथ बढ़ई का काम कर रहा होता तो क्या होता?
एक तरफ सरकारी नौकरी उस परिवार का सामाजिक स्तर बेहतर कर रही होती तो दूसरी तरफ बढ़ई का काम उसकी अर्थव्यवस्था में मजबूती देता।
परिवार में पढ़ाई-लिखाई का माहौल बनता तो बढ़ई भाई के बच्चे एक छोटी सी ही सही लेकिन अपनी कंपनी बना चुके होते। फिर उनके बच्चे उसी कंपनी के सीईओ होते और शान से कहते कि हमारी कंपनी आज की नहीं है, हमारे यहां पीढ़ियों से ये काम हो रहा है। जाहिर है बाप-दादाओं से मिला हुनर बच्चों को और तराश चुका होता।
मार्केट में वो अपने हुनर से ऐसा प्रोडक्ट पेश करता, जिसकी क्वालिटी और क्लास का कोई तोड़ नहीं होता। वो अब आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहा होता।
और सबसे बड़ी बात ये कि अपनी छोटी सी फैक्ट्री में अपना ही नहीं कई परिवारों का पेट पाल रहा होता। ये परिवार उसके अपने ही समाज के होते। सोचिए आरक्षण का ये स्वरूप कैसा होता?
नौकरी खराब नहीं होती है लेकिन ये आने वाली पीढ़ियों के जीवनयापन की श्योरिटी नहीं होती। अच्छी से अच्छी नौकरी के करने वाले बच्चे को शून्य से ही जीवन शुरू करना होता है लेकिन व्यापार में ऐसा नहीं होता। बच्चे के पास एक आधार होता है कि अगर वह अपने मन के काम में सफल न भी हो तो उसका जीवन बचाए रखने के लिए फैमिली बिजनेस होता है।
अब आते हैं मूल समस्या पर… आज सरकारें जाति और धर्म में इसलिए बांट रही हैं क्योंकि कड़वा सच ये है कि अवसर की भारी कमी है। नौकरियां हैं नहीं, न सरकार के पास न ही प्राइवेट कंपनियों के पास…. लेकिन दूसरा सच ये भी है कि काम की कमी नहीं है, दिक्कत ये है कि काम करने वाले हुनरमंद लोगों की भारी कमी है….
आज का व्यवहारिक सच ये है कि किसी कारीगर से काम कराना सिरदर्द है क्योंकि वह आपका काम लटका-लटकाकर करेगा क्यों? क्योंकि उसे पता है मार्केट में कारीगर की भारी कमी है। वह एक साथ चार काम उठाता है, दो दिन आपके यहां, दो दिन दूसरे के यहां…. फिर ऐसे ही चक्र चलाता है। आप मन मसोसकर उसका बस इंतजार ही करते रहते हैं।
मेरा मानना है अवसर की कमी इसलिए हुई है क्योंकि समाज “नौकर” बनने को आतुर है। और शिक्षण संस्थान भी नौकर ही पैदा कर रहे हैं। सोचिए बिज़नेस में मास्टरी यानि “एमबीए” करने के बाद “नौकरी” ढूंढने वाले युवा की मानसिकता क्या है!
दरअसल परम्परागत हुनरमंद काम में अवसर ही अवसर थे। आरक्षित वर्ग की कभी ये सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है, वो भी अब नौकरी ही करना चाहता है। सबसे बड़ा नुक़सान ये हुआ है। आरक्षण मिलने के बाद एक पूरा समाज लोहार, बढ़ई से लेकर तमाम हुनरवाले काम छोड़कर नौकरी करने लग गया।
हां, इससे आर्थिक स्थिति पहले से जरूर काफ़ी बेहतर हुई है लेकिन हुनर पीछे छूटता चला गया। आज अच्छी से अच्छी पढ़ाई करने वाले युवा भी नौकरी ही करना चाहते हैं। जो कुछ अपना काम करना भी चाहते हैं वो कहते हैं हमारे पास पैसा नहीं है। बिजनेस में पैसा बहुत लगता है। वो ये सोचते ही नहीं कि हुनर सीख लें, धीरे-धीरे छोटे स्तर से आगे बढ़ना शुरू करें…. धीरे-धीरे पैसा भी आएगा और हुनर भी बेहतर होगा।
यहां आप मुस्लिम समाज से सीख सकते हैं…. जो परम्परागत हुनर वाले काम थे…उन्हें धीरे धीरे मुस्लिम समाज ने अच्छे से पकड़ लिया है।
फलों का व्यापार हो या फर्नीचर बनाने तक, पाइपलाइन बिछाने वाला काम हो या जेसीबी चलाने तक हर काम मुस्लिम समाज अच्छे से कर रहा है और हम “साहब” बनने की अंधी होड़ में लगे हैं। सरकार बदलने में लगे हैं।
एक मित्र ने आंकड़ा दिया था कि आज मकान बनाने में कम से कम 70 से 80 प्रतिशत पैसा आप मुस्लिम हुनरमंद शख्स को ही देते हैं। चाहे वह सरिया काटने वाला हो, कंक्रीट मिक्स से स्लैब ढालना हो, प्लंबिंग से लेकर टाइल्स बिछाने और पुताई करने वाला, हर जगह दबदबा मुसलमानों का ही है।
क्या हमें उनसे सीखने की जरूरत नहीं है?
मेरा मानना है कि अब समय आ गया है, जब हम नौेकरी से आगे की सोचें… हम नौकरी करें तब तक जब तक हम अपनी व्यवस्था खड़ी करने के लिए पारंगत न हो जाएं। परिवार के कम से कम एक बच्चे को हुनर के काम में वापस लगाना होगा।
प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण की मांग करना गलत नहीं है लेकिन क्या कोई ये समझेगा कि कंपनी होगी तभी ना नौकरी मिलेगी? कोई तो कंपनी खोलने वाला भी चाहिए? तो आरक्षित वर्ग ही अपनी कंपनी खड़ी करे और अपने समाज को खुलकर आरक्षण दे, सोचिए फिर कौन रोक सकता है उसे….
मैला ढोने की प्रथा गलत थी ये सब जानते हैं लेकिन वही मैला सफाई का काम बड़े स्तर पर तकनीक के माध्यम से किया जाए तो ये करोड़ों का धंधा है…. लेकिन नहीं हमें ये नहीं समझना है, हमें बस हर जगह हाथ पसारना है, भईया कोई नौकरी लगवा दो।
नोट- ये लेखक के निजी विचार हैं। द कवरेज का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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