यूपी में अब प्रसूता की मौत होने पर 24 घंटे में होगा डेथ ऑडिट

Lucknow: प्रदेश में किसी भी प्रसूता की मौत होने पर 24 घंटे के भीतर आडिट किया जाएगा और कारण जानने के बाद उस जनपद में सुधारवादी कदम उठाए जाएंगे। अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य (एसीएस) अमित कुमार घोष ने यह निर्देश प्रदेश में मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के तहत दिए हैं। उन्होंने 28 नवनिर्मित स्वायत्त मेडिकल कालेजों व सभी जिला महिला अस्पतालों के डाक्टरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की भी हिदायत दी।
एसीएस बुधवार को रीज़नल रिसोर्स ट्रेनिंग सेंटर (आरआरटीसी) कार्यक्रम के 10 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के कलाम सेंटर में आयोजित समीक्षा कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। आरआरटीसी के तहत अब तक प्रदेश के 1791 चिकित्सकों की ट्रेनिंग और कार्यस्थल पर मेंटरिंग की गई है। इसके नतीजे में बीते एक दशक में मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) में 25 फीसदी की कमी आई है।
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एसीएस ने कहा कि बीते एक दशक में निश्चित तौर पर एमएमआर कम हुई है लेकिन प्रदेश में गर्भावस्था या प्रसव के दौरान हुई प्रत्येक मौत दुखद है इसलिए हमें एमएमआर को और कम करने के लिए प्रयास करते रहने होंगे। उन्होंने निर्देश दिए कि प्रदेश भर में कहीं भी किसी भी प्रसूता की मौत होती है तो उसका दैनिक स्तर पर आडिट किया जाए और कारण जानकर उस जनपद में सुधारवादी कदम उठाए जाएं। यदि किसी जनपद में बार-बार मृत्यु के मामले आ रहे हैं तो उस जनपद पर फोकस होकर काम करें। अभी तक हफ्ते में एक बार यह आडिट किया जाता था। इस कार्यशाला में प्रदेश के 20 मेडिकल कालेजों के डाक्टरों ने भाग लिया और अपने अनुभव साझा किए।
उत्तर प्रदेश टेक्निकल सपोर्ट यूनिट (यूपीटीएसयू) के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में केजीएमयू की कुलपति डॉ सोनिया नित्यानंद ने आरआरटीसी कार्यक्रम के सफलतापूर्वक लागू करने के लिए टीम को बधाई दी। उन्होंने बताया कि नैरोबी में उन्होंने प्रदेश के आरआरटीसी माडल को प्रजेंट किया तो लोग भौंचक थे कि ऐसा भी हो सकता है। डॉ सोनिया ने कहा कि जन्म लेते ही जिन नवजातों को सांस लेने में परेशानी होती है, उनके लिए सी-पैप मशीन वरदान की तरह साबित हुई है। बाल रोग विशेषज्ञों को सीपैप के बारे में प्रशिक्षित कर ढेरों नवजातों की जान बचाई जा सकी है। कार्यशाला में डीजी परिवार कल्याण डॉ शुभ्रा मिश्रा व डीजी प्रशिक्षण डॉ रंजना खरे ने भी अपने विचार रखे।
गेट्स फाउंडेशन के उपनिदेशक डॉ. देवेंद्र खंडैत ने कहा कि 10 साल पहले प्रदेश में पोस्टपार्टम हैमरेज के 20-25 प्रतिशत मामले की चिंहित हो पाते थे। आज 75 प्रतिशत मामले चिंहित हो रहे हैं और उनका मौके पर ही इलाज हो रहा है। ऐसा आरआरटीसी के तहत डाक्टरों के दक्ष होने के कारण हुआ है।
इससे पहले यूपीटीएसयू के सीनियर प्रोजेक्ट डायरेक्टर जान एंटनी ने आरआरटीसी कार्यक्रम की 10 साल की यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में जब आरआरटीसी कार्यक्रम डिजाइन हुआ उस समय एमएमआर 197 प्रति एक लाख थी। आज 2026 में घटकर 154 रह गई है।
कार्यक्रम की नोडल अधिकारी डॉ. सीमा टंडन ने बताया कि इस ट्रेनिंग के दौरान डमी के द्वारा इस तरह का अभ्यास कराया जाता है कि इमरजेंसी में किसी केस के आने के बाद किस तत्परता के साथ क्या-क्या कदम उठाने पड़ते हैं, उन सभी के बारे में विस्तार के साथ समझाया जाता है। इस अभ्यास से चिकित्सकों की गुणवत्ता में भरपूर सुधार भी नजर आया है, जिसके चलते सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है।
केजीएमयू की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष व कार्यक्रम की मेंटर डॉ. अंजू अग्रवाल ने बताया कि अब तक प्रदेश के 20 मेडिकल कालेजों के डाक्टरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और प्रशिक्षण के फायदे भी नजर आने लगे हैं। प्रदेश में वर्ष एमएमआर निश्चित तौर पर घटा दिखेगा। कार्यक्रम में केजीएमयू की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. विनीता दास, बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. एसएन सिंह, प्रोफेसर शालिनी त्रिपाठी, वीरांगना अवंती बाई अस्पताल के डॉ. सलमान खान ने भी आरआरटीसी ट्रेनिंग से डाक्टरों को हुए लाभ के बारे में बताया।
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