Health

कान से पस और कम सुनाई देना हो सकता है गंभीर, बलरामपुर अस्पताल में डॉक्टरों ने सीखी कान की जटिल सर्जरी की बारीकियां

​बलरामपुर अस्पताल में ऐतिहासिक पहल: प्रदेश के जिला अस्पतालों में पहली बार आयोजित हुई 'टेम्पोरल बोन डिसेक्शन' कार्यशाला

लखनऊ। कान से बार-बार पस आना, तेज दर्द और सुनाई कम देना सामान्य बात नहीं है। इन लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। लंबे समय तक रहने वाली यह परेशानी कान के गंभीर संक्रमण का संकेत है। क्रॉनिक ओटाइटिस मीडिया में कान के पर्दे के पीछे संक्रमण बना रहता है। कई मरीज इसे सामान्य समस्या मानकर इलाज टालते हैं। संक्रमण बढ़ने पर सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। साथ ही कान के आसपास की हड्डी भी गल सकती है।

यह जानकारी बलरामपुर अस्पताल में ईएनटी विभाग के अध्यक्ष डॉ. हिमांशु प्रताप सिंह ने दी। वह रविवार को अस्पताल में पहली बार आयोजित ‘टेम्पोरल बोन डिसेक्शन’ ((Temporal Bone Dissection)) कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला में प्रदेश भर से आए डॉक्टरों ने कान की जटिल सर्जरी की बारीकियां सीखीं।

दवाओं से ठीक न होने पर सर्जरी ही विकल्प

डॉ. हिमांशु प्रताप सिंह ने बताया कि लंबे समय तक कान में संक्रमण रहने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। शुरुआती दौर में दवाओं से संक्रमण नियंत्रित हो जाता है। अगर कान के पर्दे में छेद हो या संक्रमण हड्डी तक पहुंच जाए, तो सर्जरी जरूरी हो जाती है। मेडिकल साइंस में इसे टेम्पोरल बोन डिसेक्शन कहते हैं। इस ऑपरेशन के दौरान कान की महत्वपूर्ण नसों और संरचनाओं को सुरक्षित बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

balrampur hospital 3 e1788698048397

यह भी पढ़ें: यूपी में ‘गोल्डन ऑवर’ में मिलेगा इलाज: UPTEN नेटवर्क से जुड़ेगी इमरजेंसी सेवा, हर साल बचेंगी 12 हजार जानें

चेहरे की नस और संतुलन का रखना होता है ध्यान

डॉ. राजीव शर्मा ने कहा कि कान के बेहद करीब चेहरे की मुख्य नसें होती हैं। यहीं पर शरीर का संतुलन और सुनने की क्षमता नियंत्रित करने वाले अंग भी मौजूद होते हैं। इनकी सटीक शारीरिक बनावट की जानकारी होने से सर्जरी के दौरान जोखिम और जटिलताओं का खतरा न के बराबर रह जाता है।

कोलेस्टीटोमा बन सकता है बड़ा खतरा

लोहिया संस्थान में ईएनटी विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशीष चन्द्र अग्रवाल ने कहा कि कोलेस्टीटोमा बीमारी में कान के भीतर त्वचा और गंदगी की परत जम जाती है। यह परत धीरे-धीरे आसपास की हड्डी को गलाने लगती है। मरीज की सुनने की क्षमता घटती जाती है और संक्रमण दिमाग की ओर फैलने का डर रहता है। ऐसे मामलों में टेम्पोरल बोन डिसेक्शन सर्जरी कर मरीज की जान और सुनने की क्षमता दोनों बचाई जा सकती है।

balrampur hospital 1 e1788698062279

कार्यशाला में डॉ. मनीष चन्द्रा, डॉ. एबी सिंह, केजीएमयू ईएनटी विभाग के डॉ. अनुपम मिश्र और डॉ. दीपिका द्विवेदी समेत कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूद रहे।

ताज़ा खबरें सबसे पहले पाएं

WhatsApp Channel, Google News और सोशल मीडिया पर फॉलो करें

Sunil Yadav

संपादक, लेखक और अनुभवी पत्रकार हैं। वे दैनिक जागरण, आईनेक्‍स्‍ट, कैनविज टाइम्‍स और दैनिक जागरण आईनेक्‍स्‍ट से जुड़े रहे हैं। वह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासनिक ख़बरों, स्वास्थ्य सेवाओं, टेक्‍नोलॉजी से जुड़े विषयों पर लिखते हैं। ट्विटर (X) पर उनसे @sunilyadav21 पर जुड़ सकते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button