Opinion: सवर्णों को आरक्षण विरोध छोड़कर अति-पिछड़ों के पक्ष में क्यों खड़ा होना चाहिए?

UGC Guidelines हो या कोई और विषय, इसमें मैं बेवजह गोल गोल नहीं घूमूँगा। रोज़ रोज़ जिनकी भावनायें आहत हो रही हैं और मोदी योगी को सबक़ सिखाने के लिए मरे जा रहे हैं, उनको समस्या की असली जड़ मालूम नहीं है। यदि मैं उस पर लिखता भी हूँ तो वो उसको या तो समझते नहीं हैं अथवा समझकर भी विचार नहीं करना चाहते।
इस देश में एक मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को भी पता है कि गुज्जरों, जाटों, यादवों, कुर्मियों, कोयरियों से गुंडई करना इतना आसान काम नहीं है, उल्टा इन जाति समुच्चय में से कुछ एक जातियों से तो सभी लोग ख़ौफ़ खाते हैं। परंतु यह भी सच है कि नाइयों, लोहारों, कहारों, बियारों का संरक्षण आवश्यक है। इनको अभी कम से कम एक दो पीढ़ी संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। उससे कटु सत्य यह है कि इनको कायस्थों, ब्राह्मणों से अधिक ओबीसी के ही भूमिवान जातियों से संरक्षण की आवश्यकता है। परंतु दुर्भाग्य से देश में अति पिछड़े और भूमिवान पिछड़े दोनों एक ही ब्रैकेट में आते हैं।
यदि नाई, लोहार, कहार, बियार, कोहार के लिए कोई नियम बनता है तो वह बाय डिफॉल्ट अपने आप जाटों, गुज्जरों, यादवों, कुर्मियों और कोयरियों पर भी लागू हो जाता है। UGC की 2012 की गाइडलाइन में परिवर्तन का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने हवा-हवाई तरीके से नहीं दिया था, बल्कि कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर पाया कि कालेजों में पिछड़ों के साथ अन्याय और भेदभाव की घटनाओं में लगातार वृद्धि पाई गई है। अब इसमें रॉकेट साइंस नहीं है कि ये अधिकांश भेदभाव की घटनाएं प्रोमिनेंट ओबीसी जातियों के साथ हुआ होगा अथवा अति पिछड़ों के साथ।
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मैंने कई बार यह बात लिखा है कि सवर्णो को आरक्षण का विरोध बंद करना चाहिए क्योंकि यह विरोध ही देश में असमानता पैदा करने में सहायक हो रहा है। देश में प्रोमिनेंट ओबीसी जातियां इस लोकतंत्र में अपना हक धीरे धीरे पा रही हैं परंतु अति पिछड़े अभी भी इससे दूर हैं। जहाँ सवर्ण समाज के लोगों का जोर अति पिछड़ों को ओबीसी में ही अलग से आरक्षण दिलाने की तरफ़ होना चाहिए, वहाँ सवर्ण समाज अपनी ऊर्जा आरक्षण विरोध में लगाता है। आरक्षण का विरोध देखकर अति पिछड़े वर्ग के लोग प्रोमिनेंट ओबीसी में अपना मसीहा देखने लगते हैं और यह बात नहीं समझते कि उनका अधिकार बहुतायत में सवर्ण नहीं बल्कि प्रोमिनेंट पिछड़े खा रहे हैं।
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जब मैं यह बात लिखता हूँ तो सवर्ण समाज के लोग कहते हैं कि हम लोग क्यों अति पिछड़ों की चिंता करें? अति पिछड़ों की चिंता में आपकी भलाई छिपी है और उससे बढ़कर देश की भलाई छिपी है। देश की भलाई इस बात में है कि धीरे धीरे अंततः हर समाज अपनी भागीदारी पा जाए और देश एक समस्थिति की तरफ़ स्थिरता के लिए बढ़े। इसलिए अनावश्यक आरक्षण का विरोध बंद करने में ही समझदारी है और साथ ही अति पिछड़ों में बौद्धिक संपदा संपन्न लोग जब तक नहीं आते तब तक सवर्ण समाज को इनके पक्ष में खड़ा होना चाहिए। यह कोई एलियन आईडिया नहीं है। पिछड़ों के मसीहा चाहे वीपी सिंह रहे हों या अर्जुन सिंह या फिर लोहिया जी, ये सभी भिन्न समाज के होकर भी दिशा दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी तरह अति पिछड़ों को सहारा देना आवश्यक है, उनके लिए नहीं, बल्कि अपने लिए।

जो लोग नरेंद्र मोदी को समस्थिति लाने का विरोधी समझते हैं वे ग़लत पते पर अटक गए हैं। इस विभाजन के सैद्धांतिक आधार के लिए ही बिना किसी माँग के भी उन्होंने रोहिणी कमीशन का गठन किया। समय पर उसकी रिपोर्ट पूरी कराई जो अति पिछड़ा नैरेटिव गढ़ने का आधार स्तंभ है, लेकिन चाहे भाजपा हो, या मोदी जी हों, सभी को चुनावी राजनीति में जाना है, इसलिए इतना बड़ा मुद्दा डील करने से पहले जनसमर्थन आवश्यक है। ज़मीन पर यह दिखना अनिवार्य है कि अति पिछड़ा समाज यह विभाजन चाहता है। इसके बिना इतना बड़ा फ़ैसला हुआ तो प्रोमिनेंट ओबीसी जातियां अति पिछड़ों को यह समझाने में सफल होंगी कि भाजपा सरकार पिछड़ों में बटवारा करके उन्हें कमजोर करना चाहती है।
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मैंने यह लेख अपने मन की शांति के लिए लिखा है क्यूंकि ऐसे पचासों लेख मैं एक दो वर्ष पूर्व लिख चुका हूँ, जिन्हें तब नहीं समझ आया था, उन्हें अब भी समझ नहीं आयेगा। बाक़ी UGC कोई क़ानून नही बना सकता और हर कमेटी का माई बाप संस्था का निदेशक, डीन, प्रिंसिपल ही होता है? जिसे आख़िरी फ़ैसला लेना होता है। अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों के मुखिया सवर्ण समाज से ही हैं लेकिन यह सैद्धान्तिक विषय है जिसे बड़े बुद्धिमानी से समाज को डील करना होगा। इसके लिए शांत मत, विवेकयुक्त बुद्धि की आवश्यकता है जो अभी बहुत कम देखने को मिल रहा है और हर मुद्दे की तरह इसे भी मोदी विरोधी, मोदी हटाओ अभियान से जोड़ने में लगे हैं जो अंततः इस विचार विमर्श के मुद्दे को नारेबाज़ी में बदलकर रख देगा।




