लखनऊ विश्वविद्यालय में सतत और स्मार्ट शहरों पर मंथन, IAS अनुज कुमार झा बोले— चक्रीय अर्थव्यवस्था अपनाना जरूरी

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के लोक प्रशासन विभाग द्वारा मंगलवार को अटल सुशासन पीठ के तहत “लचीले, स्मार्ट एवं सतत शहरों की राहें” (Pathways to Resilient, Smart and Sustainable Cities) विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कुलपति प्रो. जय प्रकाश सैनी के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, पर्यावरणविदों और शोधार्थियों ने देश के शहरी भविष्य की रूपरेखा पर मंथन किया।
उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए उत्तर प्रदेश नगर विकास विभाग के सचिव, आईएएस अनुज कुमार झा ने कहा कि सतत शहरी परिवर्तन के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) को अपनाना अनिवार्य है। उन्होंने इसके तीन मुख्य स्तंभ बताए— मजबूत कानूनी ढांचा, संसाधन दक्षता के लिए औद्योगिक सहजीवन और नागरिक सहभागिता। श्री झा ने कहा, “यदि आपको दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बनना है, तो आपको सर्वश्रेष्ठ बनना ही होगा।”
सम्मानित अतिथि प्रो. अमिता कनौजिया (अधिष्ठाता, छात्र कल्याण) ने स्वदेशी वृक्षारोपण, बरगद के संरक्षण, हरित गलियारों, पेपरलेस कार्यशैली और किचन गार्डन को पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली का आधार बताया।

विभागाध्यक्ष एवं अटल सुशासन पीठ की संयोजक डॉ. वैशाली सक्सेना ने एकीकृत नियोजन और संस्थागत समन्वय पर प्रकाश डाला। उद्घाटन सत्र का संचालन सुश्री कौशांबी तोमर ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. एस. एस. चौहान ने दिया। कार्यशाला में विभिन्न संस्थानों से 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। आयोजन में डॉ. नंदिता कौशल, आएशा ज़हीर, अमित कुमार, फैसल अंसारी और गजेंद्र कुमार ने प्रमुख भूमिका निभाई।
चार तकनीकी सत्रों में इन अहम मुद्दों पर हुई चर्चा
स्मार्ट एवं लचीले शहर: प्रथम सत्र में पूर्व अपर निदेशक (नगर विकास) पी.के. श्रीवास्तव, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के प्रो. मोनोवर आलम खालिद और आरसीयूईएस के पूर्व उप निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दबावों से निपटने के लिए शहरी अवसंरचना के विकास पर बात रखी।
एकीकृत नियोजन एवं स्मार्ट गवर्नेंस: द्वितीय सत्र में आरसीयूईएस के सहायक निदेशक हिमांशु चंद्रा, यूपीएमआरसी के संयुक्त महाप्रबंधक डॉ. पंचानन मिश्रा और डॉ. नंदिता कौशल ने एजेंसियों के बीच तालमेल और तकनीक-सक्षम नागरिक सेवाओं की आवश्यकता रेखांकित की।
नीले-हरित अवसंरचना व जलवायु अनुकूलता: तृतीय सत्र में बीबीएयू के प्रो. वेंकटेश दत्ता, भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. ध्रुवसेन सिंह और डॉ. अलका सिंह ने जल निकायों, आर्द्रभूमि और प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम के जरिए बाढ़ और हीटवेव जैसी आपदाओं से निपटने के उपाय बताए।
सतत अपशिष्ट प्रबंधन: अंतिम सत्र में नगर निगम के मुख्य पर्यावरण अधिकारी संजीव प्रधान, डॉ. नसरुद्दीन और डॉ. सुशील सिंह चौहान ने वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, रीसाइक्लिंग और स्रोत पर ही कचरा पृथक्करण की सामूहिक जिम्मेदारी पर बल दिया।
ताज़ा खबरें सबसे पहले पाएं
WhatsApp Channel, Google News और सोशल मीडिया पर फॉलो करें



