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लखनऊ विश्वविद्यालय में समता संवर्धन मार्च रोका गया

राष्ट्रीय छात्र आह्वान के समर्थन में निकले छात्रों पर पुलिस का बल प्रयोग, ज्ञापन लेने नहीं पहुँचा प्रशासन।

लखनऊ। उच्च शिक्षा में लागू करने योग्य और प्रभावी समानता तंत्र को मजबूत करने के लिए दिए गए राष्ट्रीय छात्र आह्वान के समर्थन में, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने 13 फरवरी 2026 को “समता संवर्धन मार्च” आयोजित किया। यह मार्च विश्वविद्यालय के गेट नंबर 3 से शुरू होकर गेट नंबर 1 तक जाने वाला था।

मार्च स्पष्ट और संरचनात्मक मांगों के साथ आयोजित किया गया था। छात्रों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को एक अलग और कानूनी रूप से कार्रवाई योग्य संस्थागत उल्लंघन के रूप में मान्यता देने की मांग की। उन्होंने पूर्णतः स्वायत्त और प्रशासन से स्वतंत्र समान अवसर एवं भेदभाव निरोधक निकायों की स्थापना की मांग की। साथ ही राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र “उच्च शिक्षा सामाजिक न्याय आयोग” बनाने की मांग की गई, जिसे जांच, निगरानी और बाध्यकारी सिफारिशें देने की शक्ति हो।

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छात्रों ने सभी शिकायत निवारण तंत्रों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक समुदायों, महिलाओं, जेंडर विविध व्यक्तियों और विकलांग व्यक्तियों की निर्णायक भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने समयबद्ध शिकायत प्रक्रिया, विश्वविद्यालय प्रशासन से बाहर स्वतंत्र अपील व्यवस्था, शिकायतकर्ताओं को प्रताड़ना से कानूनी सुरक्षा, फेलोशिप में देरी और पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन के लिए संस्थागत जवाबदेही, हर वर्ष भेदभाव से संबंधित आंकड़ों की सार्वजनिक रिपोर्ट तथा समय-समय पर स्वतंत्र सामाजिक समानता ऑडिट की भी मांग की।

छात्रों ने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वीकार किए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले पाँच वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव और उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों में लगभग 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। छात्रों का कहना था कि शिकायतों में इतनी वृद्धि यह साबित करती है कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और मजबूत, स्वतंत्र तथा लागू करने योग्य तंत्र की आवश्यकता है।

मार्च से पूर्व प्रशासन को लिखित सूचना दी गई थी कि यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मार्च होगा। इसके बावजूद पूरे मार्ग पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। बैरिकेड लगाकर छात्रों को आगे बढ़ने से रोका गया। मार्च को बीच में ही रोक दिया गया और कई छात्र नेताओं को बलपूर्वक हिरासत में लिया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार शांतिपूर्ण मार्च कर रहे छात्र प्रतिनिधियों को खींचते हुए ले जाया गया।

छात्रों ने कहा कि यह कार्रवाई उन पहले के प्रदर्शनों से स्पष्ट रूप से अलग थी, जो समानता सुरक्षा और रोहित एक्ट की मांग के विरोध में आयोजित किए गए थे, जहां ऐसी पुलिस तैनाती या बल प्रयोग नहीं देखा गया था। छात्रों ने इसे चयनात्मक कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के रूप में देखा।

इसके अतिरिक्त, पूर्व सूचना के बावजूद जिला प्रशासन ज्ञापन लेने के लिए उपस्थित नहीं हुआ। छात्रों ने इसे लोकतांत्रिक संवाद से प्रशासनिक दूरी और छात्रों की आवाज़ की अनदेखी बताया।

भारी पुलिस कार्रवाई और हिरासत के बावजूद छात्र शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में डटे रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मांगें विश्वविद्यालयों को जवाबदेह और समानतापूर्ण बनाने के लिए हैं।

इस मार्च में आइसा, एनएसयूआई, एससीएस, बीएएसएफ, एसएफआई, बाप्सा, युवा और अंबेडकरवादी विद्यार्थी संघ सहित कई छात्र संगठनों ने एकजुटता दिखाई। व्यापक भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि उच्च शिक्षा में भेदभाव का प्रश्न पूरे छात्र समुदाय का साझा मुद्दा है।

आइसा उत्तर प्रदेश के संयुक्त सचिव हर्षवर्धन ने कहा, “जब भेदभाव की शिकायतों में तेज़ वृद्धि हो रही है, तो छात्रों को रोकना इस बात का संकेत है कि स्वतंत्र और लागू करने योग्य समानता तंत्र की कितनी आवश्यकता है।”

एनएसयूआई उत्तर प्रदेश के महासचिव शुभम खरवार ने कहा, “संवैधानिक मांग उठाने वाले छात्रों को बल से रोकना उचित नहीं है। संस्थागत जवाबदेही को दबाया नहीं जा सकता।”

एससीएस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महेंद्र यादव ने कहा, “जाति आधारित भेदभाव एक संरचनात्मक समस्या है। इसे कानूनी मान्यता और बाहरी निगरानी की आवश्यकता है।”

बीएएसएफ के वरुण आजाद ने कहा, “छात्र नेताओं को खींचकर ले जाना लोकतांत्रिक असहमति के प्रति असहिष्णुता दर्शाता है।”

एसएफआई उत्तर प्रदेश के सचिव अब्दुल वहाब ने कहा, “शांतिपूर्ण विरोध हमारा संवैधानिक अधिकार है। दमन से आंदोलन कमजोर नहीं होगा।”

युवा के अध्यक्ष अमेन्द्र कुमार ने कहा, “यदि संस्थागत समानता तंत्र प्रभावी होते, तो छात्रों को सड़कों पर नहीं आना पड़ता। बल प्रयोग समाधान नहीं है।”

युवा से जुड़े शुभम रावत ने कहा, “ज्ञापन लेने से इंकार करना छात्रों की बात सुनने से इंकार करना है।”

अंबेडकरवादी विद्यार्थी संघ के नेता विपिन कुमार ने कहा, “जब जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों को रोका जाता है, तो यह समस्या की गंभीरता को और उजागर करता है।”

अंबेडकरवादी विद्यार्थी संघ के नेता रोहित कुमार ने कहा, “दलित और वंचित छात्रों की गरिमा का सवाल प्रशासनिक रुकावट से खत्म नहीं होगा।”

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र समीर कुमार ने कहा, “हम शांतिपूर्ण मार्च कर रहे थे। हमें रोका गया और नेताओं को घसीट कर ले जाया गया। यही दिखाता है कि स्वतंत्र तंत्र क्यों जरूरी है।”

समता संवर्धन मार्च के अंत में छात्रों ने यह संकल्प दोहराया कि उच्च शिक्षा में स्वायत्त, प्रतिनिधित्व आधारित और लागू करने योग्य समानता तंत्र की मांग शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से जारी रहेगी।

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Shailendra Yadav

शैलेंद्र यादव सीनियर पत्रकार हैं। वह राजनीति, एजूकेशन, हेल्थ, लाइफ स्‍टाइल और ह्यूमन एंगल स्टोरीज लिखते हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग और दिलचस्प कहानियां भी लिखते हैं। पत्रकारिता में 12 साल का अनुभव है। करियर की शुरुआत सीतापुर लाइव न्यूज. इसके बाद विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में काम किया है।

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