कविता में उतरी जिंदगी की विवशता, मोहब्बत और इंसानियत; तालियों से गूंजा प्रेक्षागृह

लखनऊ। कविता जब जिंदगी की तल्ख हकीकतों को शब्द देती है तो आंखों के सामने संघर्षरत मनुष्य का चेहरा उभर आता है। जब वही कविता मुहब्बत की अल्हड़ हवा के साथ बहती है तो दिल की अनकही बातें जुबां पर आने लगती हैं। कभी व्यंग्य की धार व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर करती है तो कभी देशप्रेम का स्वर आत्मसम्मान की लौ प्रज्ज्वलित करता है और जब कविता इंसानियत, ईमान और उसूलों की हिफाजत की बात करती है तो वह महज साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं रह जाती, बल्कि बेहतर समाज के निर्माण की कामना बन जाती है।
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के प्रेक्षागृह में मंगलवार शाम शब्दों, सुरों और जज्बातों की अनूठी महफिल सजी। अवसर था ‘कला कारवां’ और ‘केसी लिटरेचर’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साहित्यिक उत्सव “ओमेक्स लफ्ज” के पहले संस्करण का। दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुए इस काव्य समारोह में जिंदगी की जद्दोजहद, प्रेम की कोमल अनुभूतियों, राजनीतिक विसंगतियों और मानवीय मूल्यों से लबरेज रचनाओं ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।
कार्यक्रम के दौरान रचनाकारों ने कभी व्यवस्था की कमियों पर तीखा व्यंग्य कसा तो कभी देशप्रेम और आत्मसम्मान की लौ प्रज्ज्वलित कर सभागार को तालियों की गड़गड़ाहट से भर दिया।
“ओमेक्स लफ्ज” का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसके बाद कवियों की रचनाओं ने संवेदनाओं को स्पर्श किया तो विचारों को उद्वेलित किया। श्रोताओं ने तालियों और वाहवाही के साथ रचनाकारों की भावाभिव्यक्ति का स्वागत किया।
कवि स्वयं श्रीवास्तव ने जीवन के संघर्ष को बेहद सहज, किंतु मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त किया-
रोज मन नहीं करता गाने गुनगुनाने का
जिंदगी की पुस्तक को बांचना तो पड़ता है
पैरों में बांध लिए पेट की खातिर घुंघरू
मन नहीं होता है पर नाचना तो पड़ता है।

शायर डा. बलवंत सिंह ने अपने अंदाज में समय और समाज की विसंगतियों को उकेरा-
इतनी जल्दी अगर थी जाने की, क्या जरूरत पड़ी थी आने की।
ये जमाना उसी की सुनता है, जो नहीं सुनता इस जमाने की।।
मुकुल महान की कविताओं में व्यंग्य और राष्ट्रभाव के दो अलग-अलग, लेकिन प्रभावशाली स्वर सुनाई दिए। राजनीति पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने सुनाया-
राजनीति हमारे देश का
राष्ट्रीय उद्योग है।
ये रेत के महलों को बनाने का,
अभिनव प्रयोग है।।
मुकुल महान ने राष्ट्रप्रेम को स्वाभिमान के स्वर में ढालते हुए आगे पढ़ा-
कोई भी हल कर ले मुझको
इतना भी आसान नहीं हूं।
मैं सिक्कों में बिकने वाला,
बाजारू सामान नहीं हूं।
व्यंग्य और ओज के बाद पवन प्रगीत की रचनाओं ने काव्य संध्या को प्रेम की कोमल अनुभूतियों से यूं सराबोर किया-
मुहब्बत की हसीं बस्ती में रहना चाहता है दिल।
इन्हीं अल्हड़ हवाओं संग बहना चाहता है दिल।
खबर मुझको नहीं क्या हाल होगा मेरे दिल का पर,
मुझे तुमसे मोहब्बत है ये कहना चाहता है दिल।
मोइन अल्वी खैराबादी ने व्यक्तित्व की विशिष्टता और संघर्ष से उपजे आत्मविश्वास को दो पंक्तियों में समेटा-
कभी जो खाक से उठकर गुबार होते हैं
हम ऐसे लोग कहां बार-बार होते हैं।
कवयित्री सरला शर्मा ‘अस्मां’ ने अपनी रचना में मानवीय मूल्यों, ईमानदारी और प्रेम को केंद्र में रखा-
जहां इंसान हों इंसानियत की ही वकालत हो,
सदा ईमान पर चल कर उसूलों की हिफाजत हो।
खुदा तू अपने बंदों पर करम कुछ इस तरह कर दे,
मुहब्बत में इबादत हो इबादत में मुहब्बत हो।।
इसके बाद कवि सोमनाथ कश्यप ने प्रेम को केवल व्यक्तिगत भाव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, प्रतिबद्धता और मानवीय गरिमा से जोड़ती रचना प्रस्तुत की –
प्रीत का भाव मरना नहीं चाहिए, लोक निंदा से डरना नहीं चाहिए।
वो किसी की है बेटी बहन साथियों, प्यार करके मुकरना नहीं चाहिए।
इस अवसर पर ओमेक्स लिमिटेड से राहुल श्रीवास्तव, आयोजक कैवल्य कम्युनिकेशंस के बिजनेस हेड नितिन त्रिवेदी, शेखर आनंद, आमिर रजा, दिवस चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे।
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