Health

अस्पताल फार्मेसियों में खरीद से 67 गुना तक वसूली पर UPFSDA सख्त, कीमतों के नियंत्रण के लिए NPPA को लिखा पत्र

हाई-एमआरपी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन कैपिंग और मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने की सिफारिश, अस्पताल फार्मेसियों में दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली में 67 गुना तक अंतर मिलने के बाद विभाग ने उठाया बड़ा कदम

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में दवाओं की खरीद लागत और मरीजों से वसूली जा रही कीमतों के बीच भारी अंतर पर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (UPFSDA) ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश भर के 22 मेडिकल कॉलेजों और 30 प्रमुख अस्पतालों की 200 से अधिक फार्मेसियों की जांच में खरीद मूल्य (PTR) और बिक्री मूल्य में 67 गुना तक का अंतर सामने आया है। इस अनियमितता को गंभीरता से लेते हुए UPFSDA की आयुक्त एवं सचिव डॉ. रोशन जैकब ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर नियामकीय हस्तक्षेप की मांग की है।

जांच में सामने आया कि अस्पताल सप्लायर से भारी छूट पर दवाएं खरीदते हैं, लेकिन मरीजों से ऊंची MRP के आधार पर बिलिंग की जाती है। ‘MRP माइनस’ छूट के बावजूद वास्तविक खरीद का लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

उल्लेखनीय है कि यूपी एफएसडीए की ओर से प्रदेश के प्रमुख शहरों में स्थित 22 मेडिकल कॉलेजों और 30 सरकारी एवं निजी अस्पतालों की 200 से अधिक फार्मेसियों में किए गए निरीक्षण में दवाओं, कंज्यूमेबल्स, मेडिकल डिवाइस और न्यूट्रास्यूटिकल्स की अस्पताल खरीद कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) और मरीज से लिए जाने वाले मूल्य के बीच कई मामलों में बड़ा अंतर सामने आया। कुछ मामलों में यह अंतर 67 गुना तक पाया गया। इसी को देखते हुए विभाग द्वारा एनपीपीए से हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं।

मरीज को मिले अस्पताल की खरीद का लाभ

यूपीएफएसडीए का मूल सवाल यही है कि यदि अस्पताल किसी दवा को निर्माता या सप्लायर से भारी छूट पर खरीद रहा है तो उस खरीद का लाभ मरीज तक किस हद तक पहुंच रहा है। वर्तमान व्यवस्था में पैकेजिंग पर एमआरपी अंकित होता है, जबकि अस्पतालों की संस्थागत खरीद में अक्सर ‘सबसे अधिक छूट’ के आधार पर सौदे किए जाते हैं। ऐसे में अस्पताल को मिलने वाली वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर मरीज के सामने स्पष्ट नहीं होता। विभाग ने एनपीपीए को बताया है कि ऐसी स्थिति में एमआरपी को अपेक्षाकृत ऊंचा रखने और उस पर बड़ी छूट देने की गुंजाइश बन सकती है। इससे कागज पर मरीज को एमआरपी माइनस’ के रूप में छूट दिखाई दे सकती है, लेकिन वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूले गए मूल्य के बीच का लाभ उसे नहीं मिल पाता।

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1 अक्टूबर के आदेश की एनपीपीए को दी औपचारिक जानकारी

यूपीएफएसडीए की इस पहल का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राज्य स्तर पर की गई स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई को राष्ट्रीय मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के संज्ञान में लाया गया है। आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने एनपीपीए को भेजे पत्र में विभाग की ओर से जारी 1 अक्टूबर 2026 के आदेश की भी जानकारी दी है। इस आदेश के तहत अस्पताल आधारित फार्मेसियों को अपनी वेबसाइट पर प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) और प्राइस टू कंज्यूमर (पीटीसी) से संबंधित जानकारी स्वैच्छिक रूप से सार्वजनिक करने के लिए निर्देशित किया गया है। इस आदेश में यूपीएफएस डीए ने अस्पताल फार्मेसियों के लिए केवल खरीद और बिक्री मूल्य की जानकारी तक ही बात सीमित नहीं रखी है। वेबसाइट पर फार्मेसी लाइसेंस, डिस्पेंसिंग फार्मासिस्ट, स्टॉक की स्थिति और मूल्य सूची जैसी जानकारी भी उपलब्ध और अपडेट रखने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य मरीज और उनके परिजनों के लिए दवा की कीमत से जुड़ी जानकारी को अधिक सुलभ बनाना है, ताकि वे यह समझ सकें कि अस्पताल में उपलब्ध दवा किस मूल्य व्यवस्था के तहत मरीज को दी जा रही है।

सरकारी मेडिकल कॉलेजों के ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल का उदाहरण
एनपीपीए की आधिकारिक जानकारी के अनुसार डीपीसीओ-2013 के तहत निर्धारित दवाओं की कीमतों पर मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था है और एनपीपीए सीलिंग प्राइस तथा रिटेल प्राइस से जुड़े मामलों की निगरानी करता है। यूपीएफएसडीए ने एनपीपीए को यह भी बताया है कि उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में महंगे इंजेक्शन, हाई-एंड एंटीबायोटिक्स और कैंसर की दवाओं जैसी महंगी औषधियों के मामले में ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल अपनाकर मरीजों को संस्थागत खरीद का लाभ देने की व्यवस्था का उदाहरण मौजूद है। इस मॉडल में मुद्रित एमआरपी को ही अंतिम आधार मानने के बजाय अस्पताल की वास्तविक खरीद लागत को ध्यान में रखते हुए मरीज से ली जाने वाली कीमत निर्धारित करने का प्रयास किया जाता है।विभाग का जोर इस बात पर है कि मरीज को केवल कागज पर दिखाई देने वाली एमआरपी छूट का लाभ न मिले, बल्कि अस्पताल ने जिस कीमत पर दवा खरीदी है, उस खरीद का वास्तविक लाभ भी मरीज तक पहुंचे।

एक ही ब्रांड की दवा पर अलग-अलग एमआरपी पर भी चिंता

एनपीपीए को भेजे पत्र में अस्पतालों की संस्थागत आपूर्ति से जुड़ी एक अन्य चिंता भी सामने रखी गई है। विभाग के अनुसार कुछ मामलों में एक ही निर्माता और एक ही ब्रांड नाम की दवा की अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में अलग एमआरपी होने की स्थिति सामने आई है। इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के माध्यम से अस्पतालों को ऐसे ब्रांड उपलब्ध कराए जाने की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है, जो आसपास के सामान्य रिटेल बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इससे मरीजों के पास विकल्प सीमित होने और अस्पताल की आपूर्ति श्रृंखला पर उनकी निर्भरता बढ़ने की आशंका जताई गई है।

67 गुना का अंतर केवल मुनाफे का सवाल नहीं

यूपीएफएसडीए ने अत्यधिक मूल्य अंतर को केवल मरीज से अधिक कीमत वसूले जाने का मामला नहीं माना है। विभाग ने एनपीपीए के सामने यह चिंता भी रखी है कि खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच असामान्य रूप से बड़े अंतर से दवाओं की सप्लाई चेन और मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता पर भी सवाल उठते हैं।इसलिए विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था की समीक्षा और आवश्यक नियामकीय बदलाव की जरूरत बताई है।

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एनपीपीए से चार बड़े बदलावों पर विचार का अनुरोध

डॉ. रोशन जैकब ने एनपीपीए से मुख्य रूप से चार स्तरों पर कार्रवाई पर विचार करने का अनुरोध किया है।

1. हाई-एमआरपी दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन कैपिंग: पूरे सप्लाई चेन में ट्रेड मार्जिन की व्यापक समीक्षा कर आवश्यकतानुसार अधिकतम मार्जिन तय किया जाए।

2. एमआरपी निर्धारण की प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाना: निर्माता की लागत और अधिकतम अनुमन्य पोस्ट-मैन्युफैक्चरिंग खर्च को ध्यान में रखते हुए रिटेल मूल्य निर्धारित करने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।

3. हाई-मार्जिन अस्पताल आपूर्ति वाली दवाओं को मूल्य नियंत्रण में लाना: अत्यधिक मार्जिन वाली अस्पताल आपूर्ति की दवाओं को डीपीसीओ-2013 के मूल्य नियंत्रित शेड्यूल में शामिल करने पर विचार किया जाए।

4. डीपीसीओ उल्लंघन पर नियामकीय कार्रवाई मजबूत करना: डीपीसीओ के प्रावधानों के क्रियान्वयन और उल्लंघन को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के दायरे में लाने की संभावना पर विचार किया जाए, ताकि राज्य नियामक अधिकारियों को प्रभावी कार्रवाई का अधिक मजबूत आधार मिल सके।

एनपीपीए पहले भी अस्पतालों में दवा और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों तथा बिलिंग में पारदर्शिता के मामलों को सार्वजनिक हित से जोड़कर देख चुका है।

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