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त्रेता का त्याग बनाम कलयुग का कैश-कलेक्शन : पंकज प्रसून

पंकज प्रसून 

अयोध्याधाम के नवनिर्मित प्रासाद के गर्भगृह में, निशीथ काल के गहन सन्नाटे के बीच, मर्यादा पुरुषोत्तम राम स्वर्णजटित सिंहासन पर विराजमान होकर मंद-मंद मुस्कुराते हैं। वैसी ही अलौकिक और गूढ़ मुस्कान, जैसी उन्होंने लंका विजय के पश्चात बिखेरी थी, किंतु इस हास्य में आज किंचित मर्मभेदी पीड़ा और अगाध विस्मय सन्निहित है। विगत दिनों ही गुप्तचरों (समाचार माध्यमों) द्वारा यह सूचना प्राप्त हुई कि प्रभु के उसी पावन दानपात्र में कलयुगी चतुरों ने बड़ी निर्लज्जता से सेंध लगा दी, जिस पर करोड़ों भक्तों की अगाध आस्था टिकी थी।

इस अभूतपूर्व और घृणित कृत्य पर राघव अत्यंत मर्माहत होकर अपने अनुज लक्ष्मण से बोले, “सौमित्र! वे तृणकुटीर के दिवस भी क्या अनुपम थे। न कोई विशिष्ट जन (वीआईपी) के प्रवेश का प्रपंच था, न ही किसी विशिष्ट दर्शन-पत्र (वीआईपी पास) का कोई व्यवधान था। उस फटे हुए त्रिपाल के अधोभाग में जब हम निवास करते थे, तब प्रखर ग्रीष्म की तपन भी झेली, कंपकंपाती शीत की मार भी सहीं और मेघों का जल भी सीधे हमारे विग्रह पर ही पतित होता था। किंतु नियति का कौतुक देखो लक्ष्मण, उस जीर्ण-शीर्ण पट-मंडप में कभी एक कौड़ी का भी अपहार या चोरी होना सर्वथा असंभव था! तब जन-मानस वहां कोई भौतिक संपदा अर्पित करने से दूर, बल्कि अपनी विशुद्ध श्रद्धा समर्पित करता था। आज जब हमारे ऊपर अरबों की अकूत लागत से यह भव्य प्रासाद निर्मित कर दिया गया है, तो लोग यहां श्रद्धा के विसर्जन के बजाय मात्र अर्थ-संग्रह और व्यापारिक गणना करने आते हैं।”

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लक्ष्मण ने अपने कोदंड धनुष की प्रत्यंचा को टंकारते हुए तीक्ष्ण और उग्र स्वर में कहा, “अग्रज! त्रेतायुग में संपूर्ण सृष्टि आपके अलौकिक दर्शन की अभिलाषी होकर नतमस्तक होती थी। संप्रति, इस कलयुग के आधुनिक तस्करों और मायावियों ने प्रबंधन का नवीन कूट-कौशल सीख लिया है। वे भक्ति का चोगा ओढ़कर मंदिर समिति के मुख्य आसनों को सुशोभित कर रहे हैं। जिन हुतात्मा कारसेवकों ने लाठियां और गोलियां झेलकर अपना आत्म-बलिदान दिया, जिन्होंने इस मंदिर के स्वप्न को अपने रक्त से सींचा, उनके शवों की नींव पर आज ये ‘परम भक्त’ आपके ही राजकोष को अपनी पैतृक ‘दलाली’ समझकर उदरस्थ कर रहे हैं। इन धूर्तों ने धर्म को एक निगम (कॉर्पोरेट) बना दिया है, जहां हर प्रार्थना की एक निश्चित रसीद है और हर दर्शन की एक विशिष्ट कीमत निर्धारित कर दी गई है।”

तभी वहां भ्राता भरत की अंतरात्मा भी कलयुगी प्रपंचों से अत्यंत व्याकुल और व्यथित होकर प्रकट हो गई। भरत ने राघव के श्रीचरणों का स्पर्श किया और अत्यंत भावुक तथा विस्मित मन से पूछा, “भैया! मैं इतिहास का वह अभागा भ्राता हूँ जिसने आपके चौदह वर्षों के वनगमन पर आपके चरण-पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित किया। मैं प्रतिपल विरह की अग्नि में दग्ध होता रहा, नंदीग्राम की कुटिया में रहकर कंद-मूल खाता रहा, किंतु अयोध्या के वैभवशाली राजकोष के एक कण को भी स्पर्श करना महापाप समझा। मैंने कभी आपके नाम, आपकी कीर्ति या आपकी मर्यादा का उपयोग अपने व्यक्तिगत सुख या लाभ के लिए करने का दुस्साहस भला किया ही कब था? और आज आपके ये कलयुगी अनुगामी तो महाअनर्थ कर रहे हैं! इनके मुख में आपकी नाम-माला है, जिह्वा पर आपकी सौगंध है, और जैसे ही निशाचरों की भांति रात्रि का तिमिर फैलता है, ये आपकी ही तिजोरी को पूर्णतः सम्मार्जित (साफ) कर देते हैं? क्या कलयुग में ‘भक्ति’ का पर्याय ही दस्यु-कर्म और डकैती हो गया है?”

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श्रीराम ने भरत के कंधे पर अपना वरदहस्त रखा, उनकी कमल-नेत्रों में करुणा और विरक्ति के अश्रु तैर गए। वे अत्यंत शांत किंतु मर्मस्पर्शी वाणी में बोले, “तात भरत! तुम त्रेतायुग के निश्छल भ्राता हो, तुम इस कलयुगी निर्लज्जता और पाखंड के सिद्धांतों को समझ पाने में सर्वथा असमर्थ हो। मैंने अपने संपूर्ण जीवन में केवल त्याग, मर्यादा और वैराग्य को ही सर्वोपरि माना। किसी से कुछ भी ग्रहण करना मेरे मूल ईश्वरीय स्वभाव के सर्वथा विपरीत था। लंका विजय तो कर ली थी मैंने, जो स्वर्ण की नगरी थी, अप्रतिम वैभव से युक्त थी, किंतु वहां से मैं एक तृण भी साथ लेकर आने से दूर रहा। विभीषण को वहां का राजा बनाकर रिक्त हाथ लौट आया। तात दशरथ ने राज्य का परित्याग करने को कहा, मैंने सहर्ष शिरोधार्य किया। निषादराज केवट ने जब नौका पार कराई, तो मैंने संकोचवश उसे उतराई देनी चाही। माता शबरी ने अपने उच्छिष्ट (जूठे) बेर अर्पित किए, तो मैंने उसे अगाध प्रेम से ग्रहण किया। मैंने कभी किसी नरेश, किसी प्रजा या किसी व्यवस्था से अपने लिए प्रासाद, कनक-रत्न या कनक-सिंहासन याचक बनकर मांगने की कल्पना से सदा दूरी ही बनाए रखी।”

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प्रभु ने एक गहरी श्वास ली और आगे कहा, “आज इन स्वार्थी और लोभी मानुषों ने मुझे पाषाण-शिलाओं के मध्य आबद्ध कर दिया है और मेरे नाम का विज्ञापन कर संपूर्ण विश्व से अरबों की धनराशि का संचय कर लिया। चलो, वहां तक भी सहनीय था कि इन्होंने उस संचित धन से अपनी जीविका चलाई, अपने व्यापार और वैभव को चमकाया। किंतु क्रूरता की पराकाष्ठा तो तब हो गई भरत, जब इन्होंने उस दानपात्र को भी बख्शने से पूर्णतः परहेज किया, जिसे किसी सुदूर गांव की एक दरिद्र वृद्धा ने अपनी अत्यंत अल्प वृत्ति से मात्र दस मुद्राएं निकालकर इस अटूट विश्वास के साथ समर्पित किया था कि उसके राम के राज्य में कोई भूखे रहने से बचा रहे! ये मेरे वैभव को छोड़कर, उस वृद्धा की अंतिम संचित पूंजी को चुरा रहे हैं।”

तभी सौमित्र लक्ष्मण ने एक और मर्मभेदी व्यंग्य किया, “अग्रज! कलयुग की मर्यादा का स्वरूप ही यही है। जो दशकंधर रावण त्रेतायुग में सीता का हरण करता है, वह तो दानव कहलाता है और आदि-काल से कोपाभाजन बनता है। किंतु जो आज श्रीराम के नाम पर श्रद्धालुओं की जेब कतर रहा है, उनकी अटूट आस्था का दिन-दहाड़े हरण कर रहा है, उसे यह मूढ़ और विवेकहीन समाज ‘चतुर, नीतिवान और प्रतिष्ठित’ मानकर उसके चरण-वंदन करता है। मुझे ऐसा क्यूँ लगता है कि आज ‘जय श्री राम’ का पावन उद्घोष अंतरात्मा की शुद्धि और भक्ति का पावन प्रतीक रहने के विपरीत, वित्तीय अनियमितता और महाघोटाला करने का एक सुरक्षित अधिकार-पत्र बनता जा रहा है।लगता है जिसके पास नाम-जप का पट्टा है, उसे समाज में सब कुछ हड़पने की खुली छूट मिल गई है।”

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राघव ने कलयुग की इस नवीन और विचित्र ‘मर्यादा’ पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा, “लक्ष्मण! कलयुग के इन ‘चतुर श्रद्धालुओं’ की मर्यादा तो हमारे त्रेतायुग के मायावी राक्षसों से भी दो पग आगे है। ये लोग लोक-दिखावे के लिए संसार के सम्मुख तो साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हैं, और अवसर पाते ही ‘तीसरी आंख’ यानी उस गुप्त निरीक्षण-यंत्र का ही सूत्र काट देते हैं! इन मूढ़ों को भ्रम है कि यदि इन्होंने भौतिक संसार में प्रकाश को बुझाकर गर्भगृह में तिमिर फैला दिया, तो संपूर्ण चराचर को देखने वाली मेरी सर्वव्यापी नियंता दृष्टि से ओझल होना संभव है। ये अज्ञानी इस शाश्वत सत्य को सर्वथा विस्मृत कर चुके हैं कि मेरा बहीखाता किसी आधुनिक संगणक या मनुष्यों द्वारा निर्मित कृत्रिम सर्वर पर आधारित होने के उलट ‘चित्रगुप्त के सूक्ष्म विधान’ पर निरंतर चलता है, जिसे हैक या खंडित करना इनके वश की बात नहीं।”

प्रभु ने अपने स्वर को थोड़ा और चुटीले और मारक अंदाज में ढालते हुए कहा, “जब काल का अमोघ बुलावा आएगा, तब न्यास समिति के ये परम प्रपंची, प्रबंधक और आधुनिक तस्कर अपने स्वर्ण-मुकुट, रेशमी वस्त्र तथा चुराए हुए धन के बड़े-बड़े बंडल यहीं धरा पर छोड़ जाएंगे। वहां यमराज के द्वार पर मेरे सम्मुख इन्हें कोई विशिष्ट वीआईपी प्रवेश-पत्र या ट्रस्ट की कोई मिथ्या रसीद दिखाने का किंचित अवसर मिलना असंभव है। तब मैं इनसे इस नश्वर संसार के किसी चंदे का हिसाब मांगने के बजाय, इनके जीवन भर संचित कुकर्मों का ऐसा ‘कर्मिक लेखा-परीक्षण’ करवाऊंगा कि स्वयं धर्मराज को भी इनकी विशिष्ट योग्यता देखकर इनके लिए विशेष नरक का अति-विशिष्ट कूट-कक्ष आरक्षित करना अनिवार्य हो जाएगा!”

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गर्भगृह के सन्नाटे में तीनों भाइयों के मुख पर एक गंभीर और मर्मस्पर्शी मुस्कान तैर गई, किंतु उस अलौकिक हास्य में कलयुगी मनुष्यों के लिए क्रोध का सर्वथा अभाव था, केवल अगाध करुणा, विरक्ति और दया का भाव था। सत्य ही तो है, जो संपूर्ण चराचर सृष्टि का एकमात्र पालनहार है, जिसने इस ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव को प्राणवायु और जीवन दिया, ये कलयुगी पाखंडी उसी के घर में सेंध लगाकर स्वयं को ‘धर्मरक्षक’ और ‘संस्कृति का ठेकेदार’ समझने की महती भूल कर रहे हैं। मंदिर तो कनक-रत्नों और पत्थरों से सर्वथा सुसज्जित हो गया, किंतु इन कलयुगी प्रपंचियों की दूषित नीयत का कोयला आज भी पूर्णतः अपरिवर्तित और कालिमा से युक्त ही रह गया।

पंकज प्रसूज जी के फेसबुक वाल से साभार 

Pankaj Prasoon CDRI thecoverage.net
Pankaj Prasun

भारत के हिंदी साहित्य के एक चर्चित हिंदी कवि, व्यंग्यकार, हास्‍यकार, लेखक और विज्ञान संचारक हैं। पंकज प्रसून अपनी अनूठी शैली और हास्यप्रद हिंदी कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

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