प्रदूषित हवा की कीमत किस्तों में चुका रहा समाज: डॉ. अजय वर्मा
डॉक्टर अजय वर्मा बोले- अस्पताल पहुंचने से पहले शुरू हो इलाज
Lucknow: किसी बच्चे की स्कूल से छुट्टी हो जाती है, किसी मजदूर की एक दिन की कमाई चली जाती है और किसी बुजुर्ग की सांस फूलने पर परिवार को अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ती है। प्रदूषित हवा का असर हमेशा किसी बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में सामने नहीं आता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में धीरे-धीरे जमा होता रहता है। यही वजह है कि वायु प्रदूषण को अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखने की जरूरत है।
अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस के अवसर पर डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के श्वसन चिकित्सा एवं मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अजय वर्मा ने कहा कि इलाज की शुरुआत अस्पताल पहुंचने के बाद नहीं, बल्कि बीमारी के जोखिम को कम करने से होनी चाहिए। उनके मुताबिक डॉक्टर अस्थमा, सांस की बीमारी या हृदय संबंधी समस्या का इलाज कर सकता है, लेकिन मरीज जिस हवा में वापस लौटता है, उसे अस्पताल के भीतर से साफ नहीं किया जा सकता।

डॉ. वर्मा, जो डॉक्टर्स फॉर क्लीन एयर एंड क्लाइमेट एक्शन के प्रमुख सदस्यों में हैं, ने कहा कि प्रदूषित हवा का असर केवल मरीज की सेहत तक सीमित नहीं रहता। बीमारी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, कामगारों के कार्यदिवस कम होते हैं और परिवारों पर इलाज व दवाओं का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। कई बार बीमारी बढ़ने पर अस्पताल में भर्ती तक की जरूरत पड़ती है।
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उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर मास्क का इस्तेमाल, खुले में कचरा न जलाना, अनावश्यक वाहन उत्सर्जन कम करना और प्रदूषण बढ़ने पर सावधानी बरतना मददगार है, लेकिन इससे समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसके लिए परिवहन, ऊर्जा, उद्योग, कचरा प्रबंधन और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में सामूहिक बदलाव जरूरी हैं।
डॉ. वर्मा के अनुसार स्वस्थ होने के बाद मरीज जिस वातावरण में लौटता है, वह भी उसके इलाज का हिस्सा है। लगातार खराब हवा में रहने से श्वसन और हृदय रोगों से जूझ रहे लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए स्वच्छ हवा को बीमारी की रोकथाम, बेहतर रिकवरी और स्वस्थ जीवन का आधार मानना होगा। उन्होंने कहा कि स्वच्छ हवा पर किया गया निवेश पर्यावरण पर खर्च भर नहीं है। इससे स्वस्थ बच्चे, अधिक उत्पादक कामगार, कम स्वास्थ्य खर्च और अस्पतालों पर कम दबाव सुनिश्चित किया जा सकता है।
फिजियोथेरेपी में इलाज को स्मार्ट बनाएगा एआई

मरीज के चलने, उठने-बैठने और शरीर की गतिविधियों में आए छोटे बदलावों को भी अब एआई की मदद से बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। इससे मरीज की जरूरत के मुताबिक पुनर्वास की योजना तैयार करने और इलाज के परिणामों का आकलन करने में मदद मिलेगी। हालांकि एआई फिजियोथेरेपिस्ट की जगह नहीं लेगा, बल्कि चिकित्सकीय निर्णय में सहयोगी उपकरण के रूप में काम करेगा। यह जानकारी डॉ. अजय वर्मा ने रविवार को दो दिवसीय एएसपीटी कॉनक्लेव-2026 के समापन अवसर पर दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित मूवमेंट एनालिसिस और गैट-पोश्चर असेसमेंट से मरीज की गतिविधियों में होने वाले बदलावों की सटीक निगरानी संभव है। पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन कार्यशाला में सांस के मरीजों को व्यायाम, श्वसन तकनीक और सांस फूलने के प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। केजीएमयू की टीम ने प्रतिभागियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। सम्मेलन में युवा शोधकर्ताओं ने शोध-पत्र और पोस्टर भी प्रस्तुत किए।
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