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प्रधान जी नहीं, प्रधान दीदी बोलिए

समूह की दीदी से ग्राम प्रधान बनीं कविता, गांव के विकास की थामी कमान, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ गांव के विकास को दी नई दिशा

वाराणसी, 10 अक्टूबर। नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के बीच नारी शक्ति का एक रूप निर्णय लेने के साहस में भी दिखता है। सही समय पर लिया गया एक निर्णय न सिर्फ एक महिला का, बल्कि पूरे गांव का भविष्य बदल सकता है। यह कहानी है वाराणसी के चिरईगांव ब्लॉक स्थित पतेरवा गांव की युवा ग्राम प्रधान कविता की। कभी राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के साथ काम करने वाली कविता आज पूरे गांव के विकास की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। उनकी पहचान सिर्फ ग्राम प्रधान के रूप में नहीं, बल्कि महिलाओं के बीच अपनी अलग जगह बनाने वाली ‘प्रधान दीदी’ के रूप में है।

घर की चारदीवारी से आगे बढ़ने का फैसला
कविता मिर्जापुर के एक किसान परिवार से आती हैं। बीए की पढ़ाई पूरी करते ही वर्ष 2017 में उनकी शादी वाराणसी के मिथिलेश कुमार भारती से हो गई। शादी के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं, लेकिन खुद को सिर्फ घर तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने तय किया कि वह गांव की महिलाओं के साथ जुड़कर कुछ करेंगी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत काम करते हुए उन्होंने महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। महिलाओं और ग्रामीण परिवारों के बीच रहकर उन्हें गांव की समस्याओं और जरूरतों को करीब से समझने का मौका मिला।

समूह से मिली फैसले लेने की सीख
मिशन से जुड़कर कविता ने स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के साथ पापड़, मुरब्बा, अचार और अगरबत्ती बनाने जैसे कुटीर उद्योगों में काम किया। इन गतिविधियों से महिलाओं को रोजगार से जोड़ने और उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं। इस काम ने कविता को महिलाओं की चुनौतियों, उनकी जरूरतों और सामूहिक प्रयास की ताकत से परिचित कराया। इस समूह से उन्होंने सीखा कि जब महिलाएं अपने फैसले खुद लेती हैं, तो बदलाव की शुरुआत होती है। कविता बताती हैं कि इस दौरान वह योगी सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ गांव के लोगों तक पहुंचाने और जरूरतमंदों की मदद करने का प्रयास करती थीं। लगातार लोगों के बीच रहने से उनके प्रति भरोसा बढ़ता गया।

भरोसे ने दिया बड़ा फैसला लेने का हौसला
वर्ष 2021 में ग्राम प्रधान का पद महिला के लिए आरक्षित हुआ। गांव में कविता की सक्रियता और शिक्षा को देखते हुए ग्रामीणों ने उनसे चुनाव लड़ने का आग्रह किया। उनका कहना था कि जब वह लोगों की मदद कर ही रही हैं, तो गांव की जिम्मेदारी भी संभालें। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इसके साथ परिवार और गांव दोनों की अपेक्षाएं जुड़ी थीं। फिर भी कविता ने इसे जिम्मेदारी के साथ-साथ गांव की समस्याओं के समाधान का अवसर माना और चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया। ग्रामीणों के समर्थन से गांव की बहू कविता ग्राम प्रधान बन गईं।

विंध्याचल की धरती से काशी तक का सफर
मां विंध्यवासिनी धाम की वजह से प्रसिद्ध मिर्जापुर जिले की कविता की शादी काशी के चिरईगांव ब्लॉक स्थित पतेरवा गांव में हुई। परिवार गांव में ही दुकान चलाता है, जबकि विधि स्नातक मिथिलेश एक इवेंट कंपनी से जुड़कर काम करते हैं। लगभग पांच हजार की आबादी वाले पतेरवा गांव में करीब 2,700 मतदाता हैं। ऐसे गांव में स्वच्छ पेयजल, सड़क, स्वच्छता, पंचायत भवन, लाइब्रेरी, परिषदीय स्कूलों का कायाकल्प, खेल का मैदान, सरकारी योजनाओं का लाभ और ग्रामीणों की जरूरतों से जुड़े मुद्दे ग्राम प्रधान की जिम्मेदारियों का अहम हिस्सा होते हैं। हर दिन नए फैसले लेने की यह कसौटी कविता के सामने भी है, जिसमें गांव की अपेक्षाओं पर खरा उतरना और विकास कार्यों को आगे बढ़ाना उनकी प्राथमिकता है। कविता उदाहरण हैं कि सही निर्णय लेकर महिलाएं सामाजिक बदलाव और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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