लखनऊ में ‘कलादृश्य’ प्रदर्शनी: समकालीन सृजन का जीवंत दस्तावेज़ बनी कला

लखनऊ। राज्य ललित कला अकादमी, लाल बारादरी में आयोजित “कला प्रदर्शनी: कलादृश्य” ने शहर के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक सशक्त हस्तक्षेप दर्ज किया। यह आयोजन कला को केवल दृश्य अनुभव तक सीमित न रखकर, उसे समय की स्मृतियों, संघर्षों, संवेदनाओं और जनप्रतिरोध की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता नजर आया।
कलरव, AISA और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी में बड़ी संख्या में कलाकारों, विद्यार्थियों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों की भागीदारी रही। आयोजन एक जीवंत जन-सांस्कृतिक संवाद में तब्दील हो गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन पूर्व अध्यक्ष प्रो. लालजीत अहीर ने किया। उन्होंने युवा कलाकारों की सृजनात्मक ऊर्जा की सराहना करते हुए कहा कि कला समाज की चेतना को आकार देती है और भविष्य की सांस्कृतिक दिशा निर्धारित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात मूर्तिकार सुशील कन्नौजिया ने की, जबकि वरिष्ठ कला समीक्षक शहंशाह हुसैन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में शहंशाह हुसैन ने कहा, “कलाकार अपनी कृतियों के माध्यम से अपने समय का इतिहास रचते हैं।” वहीं सुशील कन्नौजिया ने कला और बाजार के संबंधों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि संस्थान कला का प्रदर्शन तो कर सकते हैं, लेकिन संरक्षण कलाकारों को स्वयं करना होगा।
प्रदर्शनी में चित्रकला, वस्त्र कला और मूर्तिकला सहित कुल 78 कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं, जिनमें 46 कलाकारों ने भाग लिया। हर कृति अपने भीतर एक स्वतंत्र कथा और समय की गवाही समेटे हुए थी, जिसने दर्शकों को कला के साथ गहरे संवाद के लिए प्रेरित किया।
आयोजन समिति में कलरव की ओर से अतुल, पूर्वी, नीरज, रुख्मणी और जान्हवी, AISA की ओर से शांतम निधि, तथा जन संस्कृति मंच की ओर से सुचित और प्रो. धर्मेंद्र कुमार की सक्रिय भूमिका रही।
आयोजकों ने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि जन-संस्कृति, वैकल्पिक सौंदर्यबोध और लोकतांत्रिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप की एक पहल है। साथ ही भविष्य में भी ऐसे मंचों के माध्यम से कलाकारों और समाज के बीच संवाद को और मजबूत करने की बात कही गई।




