लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और सुपर स्पेशियलिटी संस्थानों में तैनात डॉक्टरों की विदेश यात्राएं अब सीधे शासन के रडार पर आ गई हैं। प्रदेश सरकार ने पिछले पांच वर्षों (2020-2025) के दौरान संकाय सदस्यों (Faculty Members) द्वारा की गई सभी विदेश यात्राओं का विस्तृत ब्योरा तलब किया है। इस सख्त आदेश के बाद से राजधानी लखनऊ सहित पूरे प्रदेश के चिकित्सा जगत में हड़कंप मचा हुआ है। जानकारी जुटाने में कई डॉक्टरों के पसीने छूट रहे हैं।
फार्मा कंपनियों और वेंडरों की फंडिंग पर विशेष नजर
शासन द्वारा जारी पत्र में सबसे अहम और चौंकाने वाला बिंदु यात्रा के खर्च (Source of Funding) को लेकर है। सरकार ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि क्या डॉक्टरों की विदेश यात्रा का खर्च किसी निजी फार्मा कंपनी या मेडिकल उपकरणों के विक्रेताओं द्वारा उठाया गया था?
इसके अलावा राज्य निधि, भारत सरकार (ICMR, DST), अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (WHO, UNICEF) या निजी खर्च की भी स्पष्ट जानकारी मांगी गई है।
बिना अनुमति विदेश जाने वालों पर कसेगा शिकंजा
उत्तर प्रदेश शासन के चिकित्सा शिक्षा अनुभाग-2 के अनु सचिव ज्ञानेन्द्र कुमार शुक्ल द्वारा 16 अप्रैल 2026 को जारी आदेश के मुताबिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों या प्रशिक्षण में हिस्सा लेने के लिए शासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। शासन का मानना है कि कई संस्थानों में इसके लिए सुस्पष्ट प्रावधान लागू नहीं थे। अब सरकार प्रशासनिक दृष्टि से सभी संस्थानों में एकरूपता लाने और नियमों का सख्ती से पालन कराने के लिए यह जांच कर रही है।
केजीएमयू सहित इन बड़े संस्थानों से मांगा गया जवाब
शासन का यह पत्र प्रदेश के सबसे प्रमुख संस्थानों को भेजा गया है। इनमें शामिल हैं:
एसजीपीजीआई (SGPGI), लखनऊ
केजीएमयू (KGMU), लखनऊ
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ
कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान, लखनऊ
राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (GIMS), ग्रेटर नोएडा
बाल रोग चिकित्सा संस्थान, नोएडा
उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई
शासन के इसी पत्र का हवाला देते हुए 15 मई 2026 को केजीएमयू के कुलसचिव ने भी अपने सभी विभागाध्यक्षों को ‘अति-आवश्यक’ नोटिस जारी कर आज ही (तत्काल प्रभाव से) यह जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
क्या हैं नियम और क्यों मची है खलबली?
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) की स्पष्ट गाइडलाइंस हैं कि कोई भी डॉक्टर या मेडिकल प्रैक्टिशनर किसी भी फार्मा कंपनी या मेडिकल उपकरण निर्माता से मुफ्त यात्रा, क्रूज़ टिकट, होटल स्टे या महंगे उपहार स्वीकार नहीं कर सकता।
अक्सर यह देखा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों (International Conferences) में हिस्सा लेने के नाम पर डॉक्टर फार्मा कंपनियों के खर्च पर विदेश जाते हैं। अगर शासन की जांच में यह नेक्सस (Nexus) सामने आता है, तो संबंधित डॉक्टरों पर नियमों के उल्लंघन में कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। यही कारण है कि पिछले 5 साल का रिकॉर्ड मांगे जाने पर कई डॉक्टर संतोषजनक जवाब तैयार नहीं कर पा रहे हैं।
संस्थानों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि इन विदेश यात्राओं से अस्पताल के शैक्षणिक और चिकित्सकीय सुधार में क्या सीधा योगदान मिला है।




