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Dr. Ambedkar: एक महान वकील जिन्हें इतिहास ने सिर्फ ‘आरक्षण दाता’ की पहचान दी

इतिहास में कई बार महान हस्तियों को एक ही सांचे में ढाल दिया जाता है। मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो को भारत-पाक विभाजन का रचनाकार मान लिया गया, जबकि उन्होंने हर विधा में लिखा। ठीक ऐसा ही डॉ. भीमराव आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) के साथ भी हुआ।

देश में आम लोगों के बीच उनकी सिर्फ दो पहचानें गढ़ी गईं: पहली, भारत के संविधान निर्माता (Constitution Maker) के रूप में और दूसरी, दलितों व पिछड़ों के लिए आरक्षण (Reservation) लागू करवाने वाले मसीहा के रूप में। लेकिन, अक्सर इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि वे 20वीं सदी के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे राजनेता और एक बेहद शानदार वकील थे।

वकालत की डिग्री और संघर्ष

डॉ. आंबेडकर ने साल 1916 में इंग्लैंड में लॉ (Law) में दाखिला लिया था। हालांकि, बड़ौदा के महाराज से मिलने वाले वजीफे की मियाद खत्म होने के कारण उन्हें बीच में ही भारत लौटना पड़ा। सिडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी करने के साथ-साथ उन्होंने प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाए, ताकि पैसे जोड़कर अपनी लॉ की डिग्री पूरी कर सकें। आखिरकार 1923 में वे अपनी डिग्री पूरी कर भारत लौटे।

उस दौर में उनके सामने कई बड़े ऑफर थे। उन्हें डिस्ट्रिक्ट जज बनने का प्रस्ताव मिला और हैदराबाद के निजाम ने उन्हें मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) का पद भी ऑफर किया। लेकिन, झुग्गी में रहने वाले आंबेडकर ने इन सभी प्रस्तावों को यह कहकर ठुकरा दिया कि इससे उनकी निजी स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी।

लेबर एडवोकेट: गरीबों और मजदूरों की आवाज

आजादी से पहले कांग्रेस के कई बड़े नेता जैसे मोतीलाल नेहरू, जिन्ना या गांधी संपन्न परिवारों से आते थे। इस पेशे में ‘सोशल कैपिटल’ (Social Capital) बहुत मायने रखती थी। इतिहासकार रोहित डे अपने लेख ‘लॉयरिंग एज पॉलिटिक्स’ (Lawyering as Politics) में बताते हैं कि जिस दिन मोहम्मद अली जिन्ना कोर्ट में 2 लाख 57 हजार रुपए का बड़ा केस लड़ रहे थे, उसी दिन उसी कोर्ट में आंबेडकर 24 रुपए फीस वाला एक गरीब रिटायर शिक्षक का मुकदमा लड़ रहे थे (और जीते भी)।

आंबेडकर ने बड़े कॉरपोरेट घरानों के बजाय मजदूरों, गरीबों और राजनीतिक बंदियों के केस लड़ने को प्राथमिकता दी।

फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन (Freedom of Expression) के पक्षधर

डॉ. आंबेडकर ने मौलिक अधिकारों के हनन के कई बड़े मामले लड़े। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ्तार किए गए कम्युनिस्ट नेता फिलिप स्प्राट और बीटी रणदिवे के राजद्रोह के केस में आंबेडकर ने ही वकालत की और उन्हें कोर्ट से बरी करवाया।

साल 1926 का मानहानि का एक केस उनकी कानूनी समझ का सबसे बड़ा उदाहरण है। केशव जेधे नाम के एक दलित लेखक ने ‘देश्चे दुश्मन’ नाम की किताब लिखी, जिसमें बाल गंगाधर तिलक की आलोचना की गई थी। इसके खिलाफ एक ब्राह्मण वकील ने मुकदमा कर दिया। आंबेडकर ने कोर्ट में दलील दी कि जिस व्यक्ति पर किताब लिखी गई है, वह अब जीवित नहीं है और केस करने वाला वकील उनका कोई करीबी रिश्तेदार नहीं है। उनका तर्क था कि कोई एक व्यक्ति पूरे समुदाय के नाम पर मानहानि का केस नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि यह लेखन गलत व्यवहार हो सकता है, लेकिन अवैध नहीं।

आंबेडकर को वकालत के पेशे में जातीय और आर्थिक दुराग्रहों का भारी सामना करना पड़ा। कदम-कदम पर उनके साथ भेदभाव हुआ। लेकिन यही वो कानूनी अनुभव और संघर्ष था, जिसके कारण उन्हें संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष चुना गया, क्योंकि वे सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि देश के सबसे काबिल लीगल एक्सपर्ट थे।

Sunil Yadav

संपादक, लेखक और अनुभवी पत्रकार हैं। वे दैनिक जागरण, आईनेक्‍स्‍ट, कैनविज टाइम्‍स और दैनिक जागरण आईनेक्‍स्‍ट से जुड़े रहे हैं। वह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासनिक ख़बरों, स्वास्थ्य सेवाओं, टेक्‍नोलॉजी से जुड़े विषयों पर लिखते हैं। ट्विटर (X) पर उनसे @sunilyadav21 पर जुड़ सकते हैं।

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