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मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता ठीक नहीं

Lucknow: देश में मेडिकल शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाने की बातें तो बहुत की जाती हैं, परंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। मेडिकल कॉलेजों में योग्य शिक्षकों की भारी कमी है, और इस कमी को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा कम योग्य चिकित्सकों को शिक्षक बनने का अवसर देना एक गहरी चिंता का विषय है।

आज के समय में जहां मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर आरक्षण या अन्य कारणों से कम योग्यता वाले लोगों को शिक्षण पदों पर बैठाना, चिकित्सा शिक्षा को खोखला बना रहा है। यही नहीं, एक अनुभवी व वरिष्ठ प्रोफेसर को डीजीएमई (DGME) का पद न देकर, एक कम उम्र के गैर-चिकित्सक आईएएस अधिकारी को यह जिम्मेदारी देना, मेडिकल शिक्षा की गंभीरता के साथ खिलवाड़ है।

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क्या यह उचित नहीं होगा कि जिस क्षेत्र का संबंध मानव जीवन से है, वहां नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हीं को दी जाए जिनके पास वर्षों का चिकित्सकीय अनुभव हो? जब एक प्रोफेसर अपने जीवन के 25-30 वर्ष चिकित्सा शिक्षा और शोध को देता है, तो उससे बेहतर नीति निर्धारण और संस्थागत नेतृत्व कौन कर सकता है?

यदि वास्तव में सरकार मेडिकल शिक्षा का स्तर ऊंचा बनाए रखना चाहती है, तो तत्काल प्रभाव से योग्य व वरिष्ठ मेडिकल प्रोफेसरों को DGME जैसे पदों पर नियुक्त करना चाहिए। तभी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को बचाया जा सकता है और भावी डॉक्टरों को उचित मार्गदर्शन मिल सकेगा।

मेडिकल शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है जहां अप्रमाणिक प्रयोग किए जाएं। यह समाज और आने वाली पीढिय़ों के स्वास्थ्य का आधार है।

लेखक प्रो. डॉ. अनिल नौसरान संस्थापक – यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स
लेखक प्रो. डॉ. अनिल नौसरान संस्थापक – यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स

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Mahima Tiwari

महिमा तिवारी, द कवरेज में सीनियर पत्रकार हैं। पत्रकारिता में 23 साल का अनुभव रखतीं हैं। वह राजनीति, हेल्थ, लाइफ स्‍टाइल और ह्यूमन एंगल स्टोरीज लिखती हैं। महिलाओं और बच्चों से संबंधित मुद्दों पर भी लिखना पसंद है।

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