लोहिया में नहीं केजीएमयू में निकाली गयी बच्ची के सिर से गोली

डेढ़ माह बाद हालत में सुधार

Lucknow: करीब डेढ़ माह पहले तीन साल की मासूम के सिर में गोली डायग्नोस की गयी। लोहिया संस्थान के डॉक्टरों ने बच्ची के सिर में फंसी गोली का पता तो लगाया मगर गोली निकालने का रिस्क नहीं उठाया। गोली फंसने की रिपोर्ट के साथ मरीज को केजीएमयू में रेफर कर दिया। केजीएमयू के डॉक्टरों ने बच्ची के सिर में फंसी गोली निकालने की चुनौती स्वीकार की और जटिल सर्जरी करते हुए बच्ची को गोली से निजात दिलायी। सर्जरी करने वाले न्यूरो सर्जन डा. अंकुर बजाज ने बताया कि अब बच्ची स्वस्थ है उसकी सेहत में सुधार हो रहा है। जल्द ही उसे डिस्चार्ज कर दिया जायेगा।

गाजीपुर के बस्तौली गांव की रहने वाली तीन वर्षीय बच्ची लक्ष्मी अपने भाई-बहन से साथ घर की छत पर खेल रही थी। अचानक तेज आवाज हुई और बच्ची के सिर से खून बहने लगा। उसके साथ खेल रहे 8 वर्षीय भाई सौभाग्य और 7 वर्षीय भाई हिमांश खून बहता देख घबरा गये। आवाज सुनकर माता-पिता भी छत पर आ गये और बच्ची को आनन-फानन में पास के निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने चोट को मामूली समझकर टांके लगा दिए और छुट्टी दे दी। बाद में देर रात बच्ची को तेज सिरदर्द हुआ और पिता उसे लेकर डा. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान गये। जहां डाक्टरों ने सीटी स्कैन कर बच्ची के सिर में गोली लगने की पुष्टि की। इसके बाद बच्ची को केजीएमयू रेफर कर दिया।

डा. बजाज ने बताया कि बच्ची को 16 दिसम्बर को शाम चार बजे गोली लगी थी। जब अगले दिन केजीएमयू लाया गया, तब चोट के लगभग 20 घंटे बाद कराए गए दोबारा सीटी स्कैन में पता चला कि बच्ची को बाई फ्रंटल बोन में गोली लगी लगी थी। गोली मस्तिष्क के गहरे बेसल क्षेत्र की ओर खिसक चुकी थी, इसलिए रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचने की आशंका को देखते हुए सर्जरी से पहले सीटी एंजियोग्राफी कराने का निर्णय लिया गया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि गोली के कारण कोई रक्त वाहिकीय चोट तो नहीं हुई है और सर्जरी की सुरक्षित योजना बनाई जा सके। लगभग 25 घंटे बाद कराई गई सीटी एंजियोग्राफी में यह पता चला कि गोली एक बार फिर खिसककर अब मस्तिष्क के ऑक्सिपिटल क्षेत्र में पहुंच चुकी थी। उनका कहना है कि इन जांचों से पता चला कि यह एक माइग्रेटरी या वांडरिंग इंट्राक्रेनियल बुलेट का मामला है, जो विश्व स्तर पर बहुत ही कम रिपोर्ट किया गया है और इतने छोटे बच्चे में अत्यंत दुर्लभ है।

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अस्पताल में भर्ती के समय बच्चा सुस्त अवस्था में था तथा शरीर के दाहिने हिस्से में कमजोरी (राइट साइड हेमीपेरेसिस) थी, जिसके कारण हाथ-पैरों में बहुत कम हरकत थी। गोली के लगातार स्थान परिवर्तन, न्यूरोलॉजिकल कमी और आगे नुकसान की आशंका को देखते हुए तत्काल सर्जरी का निर्णय लिया गया। डा. बजाज ने बताया कि सर्जरी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती गोली की लगातार बदलती स्थिति थी। जिसे इंट्राऑपरेटिव फ्लोरोस्कोपी की सहायता से संभाला गया, जिससे गोली की वास्तविक समय में सटीक स्थिति पता चल सकी और उसे आसपास के मस्तिष्क ऊतकों को न्यूनतम क्षति पहुंचाते हुए सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया।डा. अंकुर बजाज ने बताया कि सर्जरी के बाद बच्ची को तेज बुखार था और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उसे वेंटीलेटर पर रखा गया। करीब डेढ़ माह बाद अब उसकी हालत में सुधार है।

सर्जरी टीम में शामिल डॉॅक्टर

न्यूरोसर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. बी.के ओझा ने मार्गदर्शन में न्यूरोसर्जन डॉ. अंकुर बजाज, डॉ. अनुप के. सिंह, डॉ. अंकन बसु और डॉ. श्रद्धा ने यह सर्जरी की। सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया प्रबंधन डॉ. मोनिका कोहली और डॉ. नीलकमल के नेतृत्व में किया गया, जिससे ऑपरेशन के दौरान बच्चे की स्थिति स्थिर बनी रही। सर्जरी के बाद बच्चे को पीडियाट्रिक आईसीयू में स्थानांतरित किया गया, जहां बाल रोग विभाग की टीम, प्रो. एस. एन. सिंह, डॉ. शालिनी त्रिपाठी और डॉ. स्मृति जैन के नेतृत्व में, उसकी देखभाल की गई।

 

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