विजय कुमार ‘बन्धु’ बने संघर्ष की राजनीति का नया चेहरा: वेद प्रकाश आर्यनवेद

उत्तर प्रदेश का लखनऊ स्नातक खण्ड निर्वाचन क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक रूप से जागरूक रहा है। यह क्षेत्र लखनऊ, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर, बाराबंकी और प्रतापगढ़ तक फैला है। यह सिर्फ चुनावी समीकरणों का क्षेत्र नहीं है। यह शिक्षित समाज की सोच और दिशा भी तय करता है।
आजकल स्नातक चुनावों में राजनीतिक दलों और धनबल का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है। लेकिन इस बीच कुछ नए चेहरे भी सामने आ रहे हैं। ये चेहरे संघर्ष और जनसरोकारों की राजनीति को वापस ला रहे हैं। इनमें एक प्रमुख नाम विजय कुमार “बन्धु” का तेजी से उभर रहा है।
विजय कुमार “बन्धु” लंबे समय से आंदोलनों में सक्रिय हैं। वे शिक्षक, कर्मचारी, युवा, किसान और बेरोजगार वर्ग की आवाज लगातार उठाते रहे हैं। पुरानी पेंशन बहाली उनका एक प्रमुख मुद्दा रहा है। इसके अलावा वे शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के अधिकारों के लिए भी लड़े हैं। TET अभ्यर्थियों की समस्याएँ हों या निजीकरण का विरोध, बन्धु हमेशा मोर्चे पर रहे हैं। युवाओं के रोजगार को लेकर उनकी निरंतर सक्रियता ने उन्हें एक मजबूत जमीनी नेता बना दिया है।
लखनऊ स्नातक खण्ड के मतदाता अब सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक नारों से प्रभावित नहीं होते। यहां का शिक्षित वर्ग एक ऐसे प्रतिनिधि की तलाश में है जो सदन में असली मुद्दे उठा सके। यही वजह है कि विजय बन्धु का नाम चुनाव में चर्चा के केंद्र में आ गया है।
शिक्षक और कर्मचारी वर्ग में उनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। विजय बन्धु सिर्फ मंचों से भाषण नहीं देते। वे धरना-प्रदर्शन और जनसंघर्षों में सीधे हिस्सा लेते हैं। उनकी इसी आंदोलनकारी पृष्ठभूमि के कारण युवा वर्ग भी उन्हें अपना सच्चा नेता मान रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह चुनाव अब सिर्फ
किसी पार्टी की जीत-हार नहीं रह गया है। यह संघर्षशील राजनीति और धनबल की राजनीति के बीच की एक सीधी टक्कर बन गया है। स्नातक मतदाता इस बार उम्मीदवारों को उनके सामाजिक सरोकारों के आधार पर बारीकी से परख रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, अगर चुनाव में जमीनी मुद्दे और जनसंपर्क हावी रहे, तो विजय कुमार “बन्धु” एक बेहद मजबूत दावेदार साबित होंगे। युवाओं, शिक्षकों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों के बीच उनका बढ़ता प्रभाव इस चुनाव को काफी रोचक बना रहा है।



